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प्रधानाचार्य के निलंबन पर रोक, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मामला बड़ी पीठ के समक्ष रखने का दिया निर्देश

By Suresh pandey Edited By: Brijesh Srivastava
Published: Mon, 05 Oct 2026 06:42 PM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फर्रुखाबाद के कन्या विद्यापीठ इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्य डॉ. विश्वमोहिनी पांडेय के निलंबन पर रोक लगा ...और पढ़ें

इलाहाबाद हाई कोर्ट।

इलाहाबाद हाई कोर्ट।

HighLights

  1. कॉलेज प्रबंधक तथा डीआईओएस फर्रुखाबाद के आदेशों को हाई कोर्ट में चुनौती

  2. कोर्ट ने डीआईओएस द्वारा जारी अनुमोदन आदेश पर राज्य सरकार से जवाब मांगा

विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फर्रुखाबाद के कायमगंज स्थित कन्या विद्यापीठ इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्य डॉ. विश्वमोहिनी पांडेय के निलंबन के आदेश को फिलहाल स्थगित कर दिया है। कोर्ट ने जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) द्वारा जारी अनुमोदन आदेश पर राज्य सरकार से जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकलपीठ ने इस मामले को बड़ी पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया है, जो इस पर सुनवाई करेगी।

डॉ. पांडेय ने कॉलेज प्रबंधक के पहली जुलाई 2026 को जारी निलंबन आदेश और डीआईओएस के चार अगस्त 2026 के अनुमोदन आदेश को चुनौती दी है। उनका कहना है कि निलंबन का आधार बनी जांच रिपोर्ट उन्हें कभी नहीं दी गई। इसके अलावा अनुमोदन की सुनवाई में प्रबंधक का पक्ष उनकी गैरमौजूदगी में सुना गया, जिससे उन्हें जवाब देने का अवसर नहीं मिला।

याची के अनुसार एक छात्रा के पिता, जो किसान यूनियन के कार्यकर्ता हैं, ने लगातार शिकायतें की थीं। वर्ष 2025 में एक तीन सदस्यीय समिति द्वारा की गई जांच में आरोप निराधार पाए गए थे। इसके बाद नई समिति की रिपोर्ट के आधार पर निलंबन का निर्णय लिया गया।

याची की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे और प्रदीप कुमार द्विवेदी ने कहा कि धारा 16-जी(7) के तहत मंजूरी देते समय डीआईओएस को शिक्षक और प्रबंधन दोनों को सुनवाई का अवसर देना चाहिए। प्रतिवादी के अधिवक्ता योगेश कुमार सक्सेना ने कहा कि निलंबन दंडात्मक नहीं है और अधिनियम या विनियमों में मंजूरी के चरण पर सुनवाई का कोई प्रावधान नहीं है।

कोर्ट ने कहा, डीआइओएस को केवल प्रथम दृष्टया संतुष्टि दर्ज करनी होती है कि आरोपों में बल है या नहीं, और उसे संक्षिप्त कारण वाला आदेश देना आवश्यक है। हालांकि सुनवाई के सवाल पर हाईकोर्ट की दो खंडपीठों के फैसलों में मतभिन्नता है। एक मामले में सुनवाई आवश्यक बताई गई है, जबकि दूसरे में नहीं।

कोर्ट ने कहा कि एकलपीठ के लिए किसी खंडपीठ से असहमति जताना उचित नहीं होगा, इसलिए मामला बड़ी पीठ को भेजा जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रथम दृष्टया पूरी कार्यवाही जिला प्रशासन की जांच से उपजी लगती है, जबकि कार्यवाही शुरू करना शिक्षा अधिकारियों का क्षेत्राधिकार है। इसी आधार पर दोनों आदेश अगले आदेश तक स्थगित रहेंगे।

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