आसपास व्यावसायिक गतिविधि से कृषि भूमि का बढ़ सकता है स्टांप शुल्क, इलाहाबाद हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण आदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि आसपास व्यावसायिक गतिविधि होने पर कृषि भूमि का स्टांप शुल्क बढ़ सकता है। कोर्ट ने मेसर्स तुलसी इन्फ्राजोन की याचिकाएं खारिज कर दीं।

इलाहाबाद हाई कोर्ट फाइल फोटो।
HighLights
आगरा की मेसर्स तुलसी इन्फ्राजोन की दो याचिकाएं खारिज
अर्थदंड और 1.5 प्रतिशत मासिक ब्याज को दी गई थी चुनौती
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि संपत्ति का बाजार मूल्य दस्तावेज निष्पादन की तारीख पर उसकी संभावित क्षमता और उपयोग के आधार पर तय होता है। आसपास की जमीन व्यावसायिक उपयोग में हो तो कलेक्टर के लिए मूल्य निर्धारण में इस तथ्य को ध्यान में रखना अनुचित नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि हालांकि, आकलन पर्याप्त सामग्री पर आधारित होना चाहिए, केवल अनुमान पर नहीं। भविष्य में व्यावसायिक उपयोग की संभावना के आधार पर कमी तय नहीं की जा सकती। यह तर्क मान्य नहीं है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने आगरा की मेसर्स तुलसी इन्फ्राजोन प्राइवेट लिमिटेड की दो याचिकाएं खारिज कर दीं हैं।
कंपनी ने मौजा पथौली में गाटा संख्या 110 की 2815 वर्ग मीटर जमीन मेसर्स एमपी इंफ्रा स्टेट प्राइवेट लिमिटेड से खरीदी थी। चार जून 2018 को हुए बैनामे में इसे कृषि भूमि मानकर स्टांप शुल्क दिया गया। सब रजिस्ट्रार (सदर) ने दो अगस्त 2018 को स्थल निरीक्षण किया। रिपोर्ट के अनुसार आसपास आवासीय गतिविधियां थीं, पास के गाटा संख्या 108 और 109 में प्लाटिंग चल रही थी और 200 मीटर के दायरे में खेती नहीं हो रही थी।
इसके बाद भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 के तहत कार्यवाही शुरू हुई। कंपनी के प्रतिनिधि की मौजूदगी में 26 जुलाई 2022 को फिर निरीक्षण किया गया। इसमें भी पाया गया कि जमीन पर पिछले चार-पांच वर्षों से खेती नहीं हो रही और आसपास निजी बिल्डर प्लाटिंग तथा आवासीय कालोनियां विकसित कर रहे हैं। जिलाधिकारी ने 29 अगस्त 2025 को धारा 47-ए के तहत 9500 रुपये प्रति वर्ग मीटर के सर्किल रेट से जमीन का मूल्य 2.67 करोड़ रुपये से अधिक आंका। इस आधार पर 18,72,010 रुपये स्टांप शुल्क बनता था, जबकि कंपनी ने 3,95,500 रुपये जमा किए थे। कमी 14,77,510 रुपये निकाली गई।
धारा 40 (ख) के तहत 3,69,380 रुपये अर्थदंड और 1.5 प्रतिशत मासिक ब्याज भी लगाया गया। धारा 56 (1-ए) के तहत कंपनी की अपीलें 11 अगस्त 2026 को खारिज हो गई थीं। कंपनी ने दलील दी कि निरीक्षण रिपोर्ट गलत हैं, जमीन पर नियमित खेती होती रही और राजस्व अभिलेखों में भी इसे कृषि भूमि दर्ज किया गया है। स्टांप शुल्क में कोई कमी नहीं थी। उसने हाई कोर्ट की समन्वय पीठ के श्यामा देवी बनाम राज्य (2024) फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि केवल नजदीक गैर-कृषि भूमि होने से जमीन का कृषि स्वरूप समाप्त नहीं होता।
पीठ ने कहा कि दोनों निरीक्षण रिपोर्ट में जमीन पर खेती न होने और आसपास व्यावसायिक विकास की बात दर्ज है। याचिकाओं में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं दिया गया जिससे याची की मौजूदगी में हुए निरीक्षण पूरी तरह गलत साबित हों। फोटोग्राफ भी कंपनी के दावे के समर्थन में पर्याप्त नहीं पाए गए।
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