पदनाम समान होने से ही संविदा कर्मियों को समान वेतन का अधिकार नहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि केवल पदनाम समान होने से संविदा कर्मियों को नियमित कर्मचारियों के समान ...और पढ़ें

इलाहाबाद उच्च न्यायालय।
HighLights
भेल झांसी के 265 संविदा श्रमिकों के पक्ष में श्रम आयुक्त का 20 साल पुराना आदेश रद
कोर्ट ने मामला नए सिरे से सुनवाई को श्रम आयुक्त को भेजा, 6 माह में निर्णय लेने का निर्देश
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि केवल पदनाम समान होने से संविदा कर्मी नियमित कर्मचारियों की भांति वेतन के अधिकारी नहीं हो जाते। इसके लिए उन्हें नियमित कर्मचारियों के समान कार्य करने की बात भी साबित करनी होगी।
श्रम आयुक्त को कोर्ट का निर्देश
यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल), झांसी के 265 संविदा कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों के समान वेतन और भत्ते दिए जाने संबंधी श्रम आयुक्त का 20 साल पुराना आदेश रद कर दिया है। कोर्ट ने मामला नए सिरे से सुनवाई के लिए श्रम आयुक्त के पास भेजते हुए छह माह में निर्णय लेने का निर्देश दिया है।
श्रम आयुक्त ने पांच जनवरी 2005 को दिया था आदेश
श्रम आयुक्त ने पांच जनवरी 2005 को संबंधित संविदा कर्मचारियों को नियमित अकुशल कर्मचारियों के बराबर वेतन और भत्ते देने का आदेश दिया था। भेल ने हाई कोर्ट में इसे चुनौती देते हुए कहा कि कार्य, शैक्षणिक योग्यता, अनुभव, प्रशिक्षण और जिम्मेदारियों का सही आकलन नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट के स्टेट आफ पंजाब बनाम जगजीत सिंह मामले का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि समान कार्य-समान वेतन के लिए कार्य की प्रकृति, गुणवत्ता और संवेदनशीलता में समानता साबित करना जरूरी है।
भेल के अधिवक्ता की दलील
भेल के अधिवक्ता आशीष मिश्रा ने दलील दी कि यह सिद्धांत ठेका कर्मचारियों पर लागू नहीं होता। बीएचएल कान्ट्रेक्ट वर्कर्स यूनियन की ओर के अधिवक्ता केएम अस्थाना ने कहा कि लाग बुक और ड्यूटी रोस्टर से स्पष्ट है कि ठेका श्रमिक नियमित कर्मचारियों की तरह स्वतंत्र रूप से वेल्डिंग, असेंबलिंग और इलेक्ट्रिकल मेंटेनेंस का काम कर रहे हैं।
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि समान वेतन का दावा करने वाले श्रमिकों पर ही यह साबित करने का भार है कि उनका काम नियमित पद के समान गुणवत्ता और संवेदनशीलता वाला है। श्रम आयुक्त के आदेश में केवल ‘दस्तावेज देखे’ लिखकर निष्कर्ष दिया गया, लेकिन समानता मानने का कोई तर्कसंगत आधार नहीं बताया गया। बिना कारण का यह आदेश विधि की दृष्टि से त्रुटिपूर्ण और हस्तक्षेप योग्य है।
