'हिंदी मेरी मां है, अंग्रेजी विलायती मौसी', इलाहाबाद HC के न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी का सेवानिवृत्ति से पूर्व भावुक संदेश
न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी ने अपनी सेवानिवृत्ति से पूर्व न्यायपालिका में भारतीय भाषाओं के प्रयोग पर जोर दिया। उन्होंने इलाहाबाद ...और पढ़ें

इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी। जागरण आर्काइव
HighLights
फुल कोर्ट फेयरवेल में न्यायपालिका में भारतीय भाषाओं के प्रयोग को लेकर बड़ा संदेश दिया
न्यायमूर्ति डॉ. चौधरी ने हिंदी में दिए 40,000 से अधिक निर्णय, 8 नवंबर को सेवानिवृत्त हुए
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी ने अपनी सेवानिवृत्ति से दो दिन पहले फुल कोर्ट फेयरवेल में दिए गए संबोधन में न्यायपालिका में भारतीय भाषाओं के प्रयोग को लेकर बड़ा संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि भारत भौगोलिक और संवैधानिक रूप से तो अंग्रेजों से मुक्त हो गया, लेकिन आजादी के करीब 80 वर्ष बाद भी हम अंग्रेजी भाषा की गुलामी से मुक्त नहीं हो पाए हैं। यह हर भारतीय को सोचने की जरूरत है।
हिंदी की वकालत का यह अर्थ नहीं कि अन्य भाषा से बैर
न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी आठ नवंबर को सेवानिवृत्त हुए। इसके पहले फुल कोर्ट फेयरवेल में उन्होंने कहा, 'हम भले ही अंग्रेजों से संवैधानिक और भौगोलिक रूप से आजाद हो गए, लेकिन करीब 80 साल बीतने के बाद भी हमने अंग्रेजी भाषा से खुद को मुक्त नहीं किया है। यह सोचने का विषय है कि 300 साल तक हम पर शासन करने वालों की भाषा के हम आज भी क्यों गुलाम हैं?' उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी हिंदी की वकालत का यह अर्थ नहीं है कि उन्हें किसी अन्य भाषा से बैर है।
न्याय की भाषा वही हो, जिसे वादकारी समझ सके
उन्होंने एक सुंदर उपमा देते हुए कहा कि सभी भारतीय भाषाएं हमारी मौसियां हैं और अंग्रेजी विलायती मौसी है। मौसियों को पूरा सम्मान मिलना चाहिए, इसमें कोई आपत्ति नहीं। लेकिन अपनी मां, अपनी मातृभाषा को छोटा होते देखना उन्हें गहरी पीड़ा देता है। उन्होंने कहा, कितना अच्छा होगा, अगर बंगाल में निर्णय बांग्ला में लिखे जाएं, गुजरात में गुजराती में लिखे जाएं और तमिलनाडु में तमिल में लिखे जाएं। हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी का व्यापक प्रयोग हो। न्याय की भाषा वही होनी चाहिए, जिसे वादकारी समझ सके।
हिंदी में भी विचार उतनी ही सुंदरता से व्यक्त कर सकते हैं
जिला न्यायपालिका से पदोन्नत होकर आए न्यायमूर्तियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, 'अगर आप जिला अदालत में हिंदी में लिख सकते थे, तो उच्च न्यायालय में आकर अंग्रेजी में ही क्यों लिखना चाहिए? ऐसा कोई नियम नहीं है। यह केवल मन का भ्रम है कि अंग्रेजी में निर्णय ज्यादा सुंदर लगता है। हिंदी में भी हम अपने विचार उतनी ही सुंदरता से व्यक्त कर सकते हैं।'
'हिंदी में फैसला देने से न्याय आम आदमी तक पहुंचता है'
न्यायमूर्ति डॉ. गौतम का यह संदेश सिर्फ भाषण नहीं है, उनका पूरा कार्यकाल इसका प्रमाण है। 12 दिसंबर 2019 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश बने न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी ने 40 हजार से अधिक निर्णय हिंदी में दिए हैं। उन्होंने कुल 79 हजार से अधिक मामलों का निपटारा किया है। जमानत, धारा 482 की याचिकाएं, रिट और आपराधिक अपीलों में उनके हिंदी निर्णय मिसाल बन गए हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी में फैसला देने से न्याय आम आदमी तक पहुंचता है। वादकारी को अगर उसका फैसला उसकी भाषा में मिलेगा, तो उसे समझने के लिए किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। यही सच्चा न्याय है।
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