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कोर्ट नंबर 49 में हिंसा पर इलाहाबाद HC का सख्त रुख, आपराधिक अवमानना की कार्यवाही के निर्देश दिए

By Suresh pandey Edited By: Brijesh Srivastava
Published: Mon, 02 Nov 2026 07:43 PM (IST)

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोर्ट नंबर 49 में वकीलों द्वारा की गई हिंसा, मारपीट और न्यायिक कार्यवाही बाधित करने की घटना ...और पढ़ें

इलाहाबाद उच्च न्यायालय। फाइल फोटो

इलाहाबाद उच्च न्यायालय। फाइल फोटो

HighLights

  1. खंडपीठ ने लिया स्वतः संज्ञान, कहा- बार के अपराधीकरण से न्याय व्यवस्था की नींव खोखली

  2. 28 अक्टूबर को वकीलों के एक समूह ने मारपीट, तोड़फोड़ व न्यायिक कार्यवाही बाधित की थी

विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 28 अक्टूबर 2026 को कोर्ट नंबर 49 में वकीलों के एक समूह द्वारा मारपीट, तोड़फोड़ और न्यायिक कार्यवाही बाधित करने की घटना का स्वतः संज्ञान लेते हुए सख्त रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति अजय भनोट और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने 29 अक्टूबर के आदेश में इसे प्रथम दृष्टया आपराधिक अवमानना और आपराधिक अपराध का मामला पाया है।

मुख्य न्यायमूर्ति से आग्रह किया गया है कि वह रजिस्ट्रार जनरल को हिंसा - तोड़फोड़ में शामिल वकीलों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश दें। कोर्ट के अनुसार सरकारी अधिवक्ता भी अन्य अधिवक्ताओं के समान सम्मान के हकदार हैं। राज्य का कर्तव्य है कि वह अपने विधि अधिकारियों को सुरक्षा दे।

पीठ के अनुसार, अदालत बैठने से पहले पीठ सचिव ने बताया था कि कोर्ट रूम में जुटे वकील नारेबाजी कर रहे हैं। कार्यवाही शुरू होने पर वरिष्ठ अधिवक्ता वीपी श्रीवास्तव ने हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों के 27 अक्टूबर के पत्र का हवाला देते हुए कहा कि उनका अपमान नहीं हुआ था। इसके बाद वकीलों ने इतना शोर किया कि अदालत को उठना पड़ा।

अदालत उठने के बाद अपर शासकीय अधिवक्ता (प्रथम) परितोष कुमार मालवीय को कोर्ट रूम में पीटा गया। सूजे हुए चेहरे के साथ वे चैंबर पहुंचे और जान बचाने की गुहार लगाई। बताया कि राज्य की ओर से पैरवी करने के कारण हमलावरों ने उन्हें धमकी दी।

हाई कोर्ट डिस्पेंसरी के डाक्टर ने चैंबर में उपचार किया। अदालत में उपस्थित कुछ अन्य एजीए ने भी घटना की पुष्टि की। रजिस्ट्रार जनरल की रिपोर्ट के अनुसार अन्य एजीए, कोर्ट स्टाफ और सुरक्षाकर्मियों पर भी हमला हुआ तथा फर्नीचर तोड़ा गया। पीठ ने ऐसे वीडियो देखे, जिनमें हमलावर वकीलों की पहचान की जा सकती है।

पीठ ने विवाद की जड़ बार के अध्यक्ष निर्वाचित डा. सीपी उपाध्याय और महासचिव निर्वाचित संतोष कुमार मिश्र का 27 अक्टूबर का पत्र बताया। इसमें पुलिस और वरिष्ठ अधिकारियों के लिए अलग कुर्सी रखने, एक वकील से जबरन माफी मंगवाने, जज द्वारा वकील को जेल भेजने का आदेश और श्रीवास्तव का अपमान करने का आरोप था।

पीठ ने इसे भ्रामक या असत्य बताया। कहा, अदालत की सहायता के लिए बुलाए गए अधिकारी के लिए कुर्सी रखी जाती है। पुलिस अधिकारी को धक्का देने की कोशिश करने वाले वकील ने स्वयं माफी मांगी थी, लेकिन जेल भेजने का कोई आदेश न दिया गया, न रिकार्ड में है। पीठ ने कहा कि घटना के बाद इंटरनेट मीडिया पर झूठे और भ्रामक दावों से हाई कोर्ट की छवि को नुकसान पहुंचा। निर्णयों की आलोचना का अधिकार है, लेकिन जजों पर व्यक्तिगत हमले और धमकियां संरक्षित नहीं हैं।

मोहम्मद कफील बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और लखनऊ बेंच के 21 जुलाई 2026 की घटना से जुड़े स्वतः संज्ञान मामले का हवाला देते हुए पीठ ने वकीलों की आपराधिक पृष्ठभूमि और बार एसोसिएशनों की निष्क्रियता पर चिंता जताई। कहा-अपराधीकरण न्याय व्यवस्था की नींव को कमजोर कर रहा है।

अदालत ने दिए ये निर्देश

- संबंधित वकीलों के विरुद्ध प्रथम दृष्टया आपराधिक अवमानना की कार्यवाही चलाई जाए।
- मामला मुख्य न्यायमूर्ति के समक्ष रखा जाए, ताकि उसे उपयुक्त पीठ को भेजा जा सके।
- 27-28 अक्टूबर की घटना को लेकर इंटरनेट मीडिया पोस्ट डालने वालों के विरुद्ध भी एफआइआर दर्ज हो। पोस्ट ब्लाक व डिलीट कराएं।
- रजिस्ट्रार जनरल की 28 अक्टूबर की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में रिकार्ड पर रखी जाए।

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