विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

इंसानी दखल ने छीनी 'मिठ्ठी' की आजादी: 5 मौतों के बाद कानपुर चिड़ियाघर के बाड़े में उम्रकैद काटने को मजबूर शांत बाघिन

Published: Sun, 04 Oct 2026 07:30 AM (IST)

इंसानी दखल के कारण आक्रामक हुई बाघिन 'मिठ्ठी' को पांच लोगों की जान लेने के बाद कानपुर चिड़ियाघर में कैद ...और पढ़ें

कानपुर चिड़ियाघर के बाड़े में बैठी बाघिन। स्त्रोत: विभाग

कानपुर चिड़ियाघर के बाड़े में बैठी बाघिन। स्त्रोत: विभाग

HighLights

  1. एक वर्ष से अधिक समय से कानपुर चिड़ियाघर के बाड़े में रहने को मजबूर बाघिन

  2. बीते वर्ष पांच लोगों की मौत का बनी थी कारण, शांत स्वभाव के मिला था मिठ्ठी नाम

सृजित अवस्थी, पीलीभीत। नाम मिठ्ठी और स्वभाव भी बेहद शांत, लेकिन नियति ने उसके साथ ऐसा खेल खेला कि वह पांच इंसानों की मौत का कारण बन गई। कभी गन्ने के खेतों में सुकून से विचरण करने वाली बाघिन की दुनिया अब चंद लोहे की सलाखों के बीच सिमट कर रह गई है।

बाघिन की इस बेबसी के पीछे कोई और नहीं, बल्कि उसके घर में बढ़ती इंसानी दखलंदाजी है। इसने उसके शांत स्वभाव को इतना उग्र बना दिया कि उसे खुली आबोहवा से हमेशा के लिए बेदखल होना पड़ा।

बीते एक वर्ष से अधिक समय से वह कानपुर चिड़ियाघर के एक पिंजरे में कैद है। अब उसकी जंगल वापसी की हर उम्मीद खत्म हो चुकी है। यह कहानी एक दो नहीं बल्कि पीटीआर के 12 बाघ-बाघिनों की है।

चिड़ियाघर भेजे जाने से पहले खेत किनारे बैठी बाघिन। स्रोत इंटरनेट मीडिया

शुरुआती दौर में इस बाघिन का इंसानों के प्रति कोई आक्रामक रवैया नहीं था। वह अक्सर गन्ने के खेतों में रहती थी। बिना किसी को नुकसान पहुंचाए अपना जीवन बिता रही थी। इसी सहजता को देखकर वन्यजीव प्रेमी हरविंदर सिंह मान ने उसे प्यार से मिठ्ठी नाम दिया था।

हालांकि, समय के साथ खेतों और जंगल के आसपास इंसानी गतिविधियां तेजी से बढ़ने लगीं। लोग उसकी एक झलक दिखते ही हजारों की संख्या में इकठ्ठे हो जाते थे। कई लोग तो उस पर पत्थर तक फेंकते देखे गए।

अपने ही इलाके में खुद को घिरता और असुरक्षित महसूस करने पर बाघिन का व्यवहार बदलने लगा। बीते वर्ष मई में इस बाघिन ने पीलीभीत की हरिपुर और शाहजहांपुर की खुटार रेंज के आसपास अपना ठिकाना बनाया था।

इसी दौरान इंसानों से अचानक सामना होने पर उसने दो लोगों की जान ले ली। वन विभाग ने उसे रेस्क्यू कर जंगल में छोड़ दिया। उम्मीद थी कि वह जंगल के शांत माहौल में ढल जाएगी, लेकिन गन्ने के खेतों की आदी हो चुकी मिठ्ठी जल्द ही फिर से बाहर आ गई।

इस बार उसने बनकटी क्षेत्र के खेतों में अपना नया डेरा डाला। जून से जुलाई के बीच आक्रामक हो चुकी बाघिन के हमले में तीन और लोगों की जान चली गई। लगातार हो रहे हादसों से ग्रामीणों का विरोध काफी बढ़ गया।

विरोध को देखते हुए वन विभाग को जुलाई में उसे दोबारा रेस्क्यू करना पड़ा। बार-बार आबादी की ओर आने की प्रवृत्ति के कारण उसे हमेशा के लिए कानपुर चिड़ियाघर भेज दिया गया। चिड़ियाघर के शुरुआती दिनों में मिठ्ठी काफी तनाव में थी।

उसे कई महीनों तक एकांत में रखा गया था। अब एक साल से अधिक का समय बीत चुका है, अब उसने बाड़े के इस सीमित दायरे को अपनी नियति मान लिया है। वर्तमान में उसका स्वास्थ्य सामान्य है। लेकिन वह बाड़े में भी अक्सर खामोश ही देखी जाती है।

वन्यजीवों के आवास में दखल से बचें

पीटीआर डीएफओ मनीष सिंह ने बताया कि बाघ अमूमन शांत स्वभाव के होते हैं। बीते वर्षों में हुए मामले इस बात का सुबूत है कि वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में जब इंसानी दखल बढ़ता है, तो वे असुरक्षित महसूस कर आक्रामक हो जाते हैं।

ग्रामीणों से अपील है कि जंगल की सीमाओं का सम्मान करें और उनके पर्यावास में अनावश्यक हस्तक्षेप न करें। जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं से बचा जा सके।

 

शुरुआती दौर में बाघिन तनावग्रस्त रही थी, लेकिन समय के साथ उसने यह बदलाव अपना लिया। वह अब पूरी तरह से सामान्य है। वह अपनी पूरी खुराक ले रही है। लोगों को जंगल में दखल से बचना चाहिए। कुछ देर का रोमांच किसी वन्यजीव के लिए उसकी आजादी का सौदा बन सकता है।

- डाॅ. नासिर खान. पशु चिकित्साधिकारी, कानपुर प्राणी उद्यान


यह भी पढ़ें- गैंडों के संरक्षण में भारत की बड़ी छलांग: दुधवा में 53 हुए गैंडे, अब पीलीभीत टाइगर रिजर्व में 'गैंडा प्रोजेक्ट' की तैयारी

यह भी पढ़ें- पीलीभीत टाइगर रिजर्व: तेज रोशनी और हॉर्न का शोर कर रहा वन्यजीवों को बीमार, बहरेपन की चपेट में बाघ