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    Noida News: मधुबनी कला की परंपरा पोशाकों में सुंदर चित्रण में आ रही काम, पढ़िए सीता-विवाह से क्या था इसका ताल्लुकात

    By Vaibhav TiwariEdited By: Pradeep Chauhan
    Updated: Tue, 29 Mar 2022 02:43 PM (IST)

    सेक्टर-21-ए स्थित नोएडा स्टेडियम के क्राफ्ट मेला में मिथिला पेंटिंग का स्टाल लगाए बिहार के मधुबनी जिला के बेनीपट्टी गांव के रहने वाले गोपाल गिरी भी सांस्कृतिक लोक कला में नवाचार का प्रयोग कर सफल उद्यमी बनने की तरफ अग्रसर है।

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    गोपाल गिरी अपने मां, पत्नी, भाई और भाभी के साथ मिलकर मधुबनी कला से आय कमा रहे हैं।

    नोएडा [वैभव तिवारी]। सीता-विवाह से शुरू हुई मधुबनी कला की परंपरा शताब्दियों तक शुभ कार्य के मौके पर घर की दीवार सजाने के काम में आती रही है। मौजूदा समय में मधुबनी कला में नवाचार का प्रयोग करने से जहां एक तरफ सांस्कृतिक लोक कला का संवर्धन हो रहा हैं, वहीं दूसरी तरफ कला जीवन में आय का आधार बन गई है। कभी दीवारों को सुंदर बनाने वाली कला आज पोशाकों में सुंदर चित्रण के साथ उकेरी जा रही है। यहीं नहीं इसकी पेंटिंग में आध्यात्मिक, प्राकृतिक और सामाजिक स्थितियों का भी चित्रण किया जा रहा है।

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    पारंपरिक रूप से बांस की कलम से दीवारों को सजाए जाने वाली कला में फूलों और पत्तियों के रस में बबूल और दूध के घोल से मिलाकर आवश्यकता अनुसार रंग का उपयोग किया जाता है। वहीं कला में नवाचार का प्रयोग होने से यह आय का आधार बन गया है। सेक्टर-21-ए स्थित नोएडा स्टेडियम के क्राफ्ट मेला में मिथिला पेंटिंग का स्टाल लगाए बिहार के मधुबनी जिला के बेनीपट्टी गांव के रहने वाले गोपाल गिरी भी सांस्कृतिक लोक कला में नवाचार का प्रयोग कर सफल उद्यमी बनने की तरफ अग्रसर है।

    गोपाल पेंटिंग करने के लिए मौजूदा समय में बांस की कलम के बजाय ब्रश का उपयोग करते हैं। वहीं फलों के रस की जगह वह फैब्रिक रंग का उपयोग अपने उत्पादों में करते हैं। इस दौरान कपड़े धुलने पर रंग नहीं छोड़ते हैं। सरकारी कैंप में पेशेवर कलाकृति के गुण सीखने के बाद से शुरू किए कार्य में गोपाल आनलाइन व्यापार करने के साथ देश के विभिन्न शहरों के मेले में जाकर स्टाल लगा रहे हैं।

    साड़ी पर कलाकृति उकेरने में लग जाते हैं 20 दिन : सिल्क और सूती कपड़ों पर नक्काशी करने वाले गोपाल गिरी बताते हैं कि सीता-राम, राधे-कृष्ण, कोहबर सहित अन्य कई तरह की कलाकृतियां कपड़ों पर उकेरते हैं। इसमें सिल्क की साड़ी, कुर्ता के साथ चादर, दुपट्टा, पाग, आभूषण पर्स और टेबल लैंप सहित अन्य सामान शामिल हैं। जिस पर फैब्रिक रंग से कलाकृतियां बनाई जाती हैं। गोपाल गिरी बताते हैं कि एक साड़ी में पेंटिंग करने में 20 दिन का समय लग जाता है। इस दौरान फ्रेम पर कपड़ों को टाइट कर फैब्रिक रंगों से कलाकृतियां ब्रश द्वारा बनाई जाती हैं।

    मिथिलांचल में घर-घर में हैं कला की धूम : मधुबनी जिले से आने वाले गोपाल गिरी अपने मां, पत्नी, भाई और भाभी के साथ मिलकर मधुबनी कला से आय कमा रहे हैं। वह बताते हैं कि बिहार के मिथिलांचल के प्रत्येक घर में इस कला के जरिये कलाकृतियां बनाई जाती है। हालांकि ज्यादातर लोगों ने इसे आय का आधार नहीं बनाया है। भागलपुर और कलकत्ता से कच्चा माल मंगाकर उसपर पेंटिंग बनाने वाले गोपाल गिरी के पास सिल्क पर कलाकृति बनाई हुई सबसे महंगी साड़ी 12 हजार रुपये की है। वहीं उनके पास दुपट्टा सहित कुर्ती व अन्य सामान तीन सौ रुपये तक में हैं।

    मधुबनी पेंटिंग को मिल चुके हैं विभिन्न स्तर पर पुरस्कार : मधुबनी पेंटिंग में सीता देवी को बिहार सरकार द्वारा राज्य पुरस्कार 1969 में दिया गया। 1975 में राष्ट्रपति ने जगदंबा देवी को पद्मश्री पुरस्कार और मधुबनी के पास जितवारपुर गांव की सीता देवी को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया है। वहीं 1934 में भूकंप आने पर ब्रिटिश अधिकारी विलियम आर्चर मिथिलांचल में मुआयना करने पहुंचे। इस मौके पर उन्होंने एक टूटी दीवार में पेंटिंग देखकर इसकी तुलना मिरो और पिकाशो के पेंटिंग से की। इस मौके पर एक तस्वीर भी ली गई। वही 1949 में उन्होंने ‘मार्ग’ नाम से एक आर्टिकल लिख कर मधुबनी पेंटिंग की तारीफ की थी।