नोएडा [जयश्री पुरवार]। कोलकाता के जोरासांको के ठाकुरबाड़ी में अपने मामा के घर नौ सितंबर, 1872 को सरला देवी ने जन्म लिया था। मां स्वर्ण कुमारी देवी, महॢष देवेन्द्रनाथ ठाकुर की दसवीं संतान और रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बड़ी बहन थीं, जो उस समय की एक सफल लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता भी थीं। पिता जानकीनाथ कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे, जिन्होंने पत्नी को हमेशा सामाजिक कार्यों के लिए प्रेरित किया। ऐसी विशिष्ट दंपती की संतान थीं सरला देवी।

बीए में मिला स्वर्ण पदक

मां स्वर्ण कुमारी देवी लेखन कार्य में लगी रहती थीं। इसलिए सरला देवी का बचपन दासियों की देखरेख में ही बीता। उन्होंने अपनी आत्मकथा जिबोनेर झरापाता में लिखा है कि जब 13 साल की उम्र में बेथुन कालेज की प्रवेश परीक्षा मे सर्वोच्च अंक पाकर दाखिला पाया तो घर के लोग उनकी ओर मुखातिब हुए। इसके बाद बीए में सर्वोच्च अंक पाकर पद्मावती स्वर्ण पदक भी पाया।

विवाह के बाद भी मां की पत्रिका में करती थीं मदद

मां स्वर्ण कुमारी द्वारा संपादित पत्रिका भारती से वह बचपन से ही जुड़ गई थीं। भारती पत्रिका को ठाकुर बाड़ी की सीमारेखा से बाहर निकालने का श्रेय भी सरला देवी को ही जाता है। विवाह के बाद भी वह पंजाब से इस पत्रिका के संपादन और संचालन के लिए कलकत्ता (अब कोलकाता) आती रहती थीं।

लेखिका के साथ थीं अच्छी गायिका

अच्छी लेखिका होने के साथ ही वह अच्छी गायिका भी थीं। वह किशोरावस्था से ही राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ चुकी थीं। वर्ष 1901 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने 58 गायक-गायिकाओं की टोली के साथ उद्बोधन गीत प्रस्तुत किया था। वर्ष 1905 में बनारस कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने अपने साथियों के साथ वंदे मातरम गाया, वह भी तब जब इस गाने पर प्रतिबंध लगा था। उन्होंने जगह-जगह वंदे मातरम गाकर विदेशी शासन के अधीन और गहरी नींद में सोए लोगों को जगाने का प्रयत्न किया था। हालांकि इसके पहले से ही सरला देवी कांग्रेस में और स्वदेशी आंदोलन में उत्साह से भाग ले रही थीं।

कलकत्ता के मानिकतला में लक्ष्मी भंडार की स्थापना

महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए वर्ष 1904 में उन्होंने कलकत्ता के मानिकतला में लक्ष्मी भंडार की स्थापना की और हस्त शिल्प में रोजगार दिलाया। इसके साथ ही स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग को बढ़ावा दिया। बंगाल के युवा वर्ग को संगठित करने के लिए उन्होंने शिवाजी उत्सव की तरह प्रतापादित्य उत्सव प्रारंभ किया। वह ढाका (अब बांग्लादेश में) की क्रांतिकारी संस्था अनुशीलन समिति से भी जुड़ी रहीं और क्रांतिकारियों को आॢथक सहायता देती रहीं। सरला देवी के प्रयासों ने बंगाल में महिलाओं के लिए राजनीतिक भागीदारी का मार्ग प्रशस्त किया। ब्रह्म समाज की उदारवादी परंपराओं ने सरला देवी के व्यक्तित्व में स्वाभिमान भी भरा। जिस दौर में 14-15 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले ही लड़कियों का विवाह हो जाता था, सरला देवी ने 33 वर्ष की आयु तक अविवाहित रहकर देशसेवा में सक्रिय भागीदारी निभाई।

1905 में किया था प्रेम विवाह

कांग्रेस के अधिवेशनों के दौरान सरला देवी का परिचय पंजाब के कांग्रेसी नेता रामभज दत्त चौधुरी से हुआ। उनके ओजस्वी भाषणों को सुनकर सरला देवी ने कहा था- यह वह व्यक्ति हैं जिनसे मैं शादी कर सकती हूं। वर्ष 1905 में सरला देवी ने रामभज दत्त चौधुरी से प्रेम विवाह किया। हालांकि, इससे पूर्व रामभज दत्त का दो बार विवाह हो चुका था, लेकिन वह विधुर थे। रामभज दत्त पत्रिकाएं भी निकालते थे। विवाह के बाद वह पत्रिकाओं के कार्यों में पति की सहायता करने लगीं। जालियांवाला कांड के बाद उनके पति पर राजद्रोह का मुकदमा चला और वह जेल चले गए, लेकिन सरला देवी पति के जेल जाने बाद भी पत्रिकाएं निकालती रहीं।

भारतीय स्त्री महामंडल की स्थापना की

सरला देवी ने वर्ष 1910 में इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में भारतीय स्त्री महामंडल की स्थापना की। इसे भारत के पहले महिला संगठन के तौर पर जाना जाता है। इस संगठन का मुख्य लक्ष्य था महिला शिक्षा को बढ़ावा देना, जो उस समय की महती जरूरत थी। इस संगठन ने पूरे भारत में महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए कई केंद्रों की स्थापना की।

महिलाओं की शिक्षा के लिए भी छोटे-छोटे कई केंद्र खोले

शादी के बाद पंजाब में रहकर सरला देवी ने महिलाओं की शिक्षा के लिए भी छोटे-छोटे कई केंद्र खोले साथ ही उन्होंने महिलाओं में जागरूकता लाने के प्रयास भी किए। इसी कारण उन्हेंं पंजाब की शेरनी भी कहा गया। प्रारंभ में सरला देवी ने राष्ट्रीय आंदोलन में एक उग्र राष्ट्रवादी के रूप में अपना समर्थन दिया, पर बाद में गांधीजी के प्रभाव में आकर वह अहिंसा और सत्याग्रह की समर्थक बन गईं। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान गांधीजी जब पंजाब आए तो उन्होंने उनको अपने घर पर ठहराया। बाद में वह गांधीजी के साथ दौरे पर जाने लगीं और सभाओं में भाषण भी देने लगीं। वह खादी के वस्त्र पहनने लगीं साथ ही उत्साहपूर्वक खादी का प्रचार करने लगीं।

अध्यात्म के प्रति झुकाव बढ़ा

साबरमती आश्रम में निवास के दौरान वह गांधीजी के काफी निकट आईं। हालांकि कुछ दिनों बाद सरला देवी का गांधीजी की पद्धतियों से विश्वास उठ गया था। अस्वस्थ होने पर सरला देवी ने एक आश्रम में निवास किया। बाद में ऋषिकेश में अपना आश्रम बनवाकर तपस्विनी की भांति जीवन बिताया। हालांकि, पति की मृत्यु से ठीक पहले वह अपने नाबालिग पुत्र दीपक की देखभाल के लिए गृहस्थ जीवन में वापस आ गई थीं। तब उनमें अध्यात्म के प्रति झुकाव आ गया था। फिर भी वह स्त्री शिक्षा के लिए समय देती रहीं। 18 अगस्त, 1945 को उन्होंने सांसारिक जीवन को अलविदा कह दिया। सरला देवी चौधुरानी अपने जीवनकाल में बंगाल की जोन आफ आर्क भी कहलाईं। वह सही मायने में नारीवादी और राष्ट्रवादी आंदोलनकारी थीं। ऐसी राष्ट्रवादी और नारीचेतना की प्रतिमूतयों ने ही देश की महिलाओं में स्वाभिमान जगाया।

Edited By: Prateek Kumar