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    राग खमाज में श्रंगार रस के दोनों पक्षों, संयोग और वियोग की मनोहर अभिव्यक्ति

    By Sanjay PokhriyalEdited By:
    Updated: Mon, 29 Aug 2022 04:37 PM (IST)

    प्रख्यात सितारवादक पंडित रविशंकर के घराने का प्रचलित मांझ खमाज भी खमाज का एक सुंदर प्रकार है जिसमें उन्होंने अनुराधा फिल्म के लिए लता मंगेशकर से मर्मस्पर्शी गीत कैसे दिन बीते कैसे बीती रतियां पिया जाने ना गवाया था।

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    राग खमाज में श्रंगार रस के दोनों पक्षों, संयोग और वियोग की मनोहर अभिव्यक्ति पाई जाती है....

    नोएडा, सुनन्दा शर्मा। खमाज राग का प्रयोग मुख्यत: उपशास्त्रीय संगीत, ठुमरी-टप्पा और होरी गायन में किया जाता है। राग खमाज अपने थाट का आश्रय राग है और इससे संगति बिठाने वाले ढेरों राग मसलन- मांड, झिंझोटी और पहाड़ी साथ मिलकर खिलते हैं। मनोहारी ढंग से मन पर छा जाने वाले इस राग में कोई शास्त्रीय गायक यदि ठुमरी के लिए इसका चयन करता है, तो अनायास ही खमाज के सौंदर्य से शास्त्र और भाव का सामंजस्य बेहतरीन ढंग से दिखाई पड़ता है।

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    पूर्वी उत्तर प्रदेश और बनारस में राग खमाज को गाने का बड़ा प्रचलन रहा है, क्योंकि इन स्थानों पर उपशास्त्रीय गायन की ढेरों विधाओं में विभिन्न घरानों में बहुधा गायन होता रहा है। खमाज के साथ हम इसी समय पीलू, झिंझोटी और कौशिक ध्वनि को भी इसी श्रेणी में रखकर देख सकते हैं। अधिकतर ठुमरी, कजरी में मिश्र खमाज का प्रयोग होता रहा और लोक संगीत में भी इस राग के सुंदर दर्शन होते हैं। एक बात याद आ रही है- बनारस के कबीर चौरा में एक सहज गृहिणी द्वारा कैसे खमाज राग की यह सुंदर रचना रची गयी। किस्सा है कि उसका पति कार्यवश शहर से बाहर गया हुआ था और जब वह कई वर्षों तक नहीं लौटा, तो उस स्त्री के कंठ से स्वत: ही यह बोल निकल पड़े, जो बाद में बनारस में जाकर खमाज की प्रसिद्ध ठुमरी के रूप में प्रतिष्ठित हुए। आज इस ठुमरी को बनारस घराने के प्रतिष्ठित कलाकार गाते-बजाते पाए जाते हैं। ठुमरी के बोल हैं- 'छवि दिखला जा बांके सांवरिया/ ध्यान लगौ मोहे तोरा/ बांकी चितवन नैना रसीले/ चाल चले मतवारी/ का करूं कित जाऊं सखी री/ ना मानै मोरा जियरा/ ध्यान लगौ मोहे तोरा।' मूल रूप से इसका स्वभाव करुण रस से भरा हुआ है। पारंपरिक रूप से इस राग का वादी स्वर गंधार व संवादी बड़ा स्वर निषाद है। जो लोग बनारस से जुड़ाव रखते हैं, वे बखूबी जानते हैं कि उस्ताद बिस्मिल्ला खां की शहनाई के साथ राग खमाज का कितना जबर्दस्त रिश्ता रहा है।

    हिंदी फिल्म संगीत में भी खमाज या मिश्र खमाज पर आधारित सैकड़ों गीतों की रचना हुई है। मिश्र खमाज में रचे गए प्रसिद्ध फिल्मी गीतों में कुछ आज भी अपने सुरीलेपन में अनूठे जान पड़ते हैं। इनमें लता मंगेशकर के गाए- 'नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे' (मदर इंडिया), 'अजी रूठकर अब कहां जाइएगा' (आरजू) और 'ठाढ़े रहियो ओ बांके यार' (पाकीजा) विशेष तौर पर याद किये जा सकते हैं, जिनमें किशोर कुमार का 'अमर प्रेम' का प्रसिद्ध गीत 'कुछ तो लोग कहेंगे' भी शामिल है। प्रख्यात सितारवादक पंडित रविशंकर के घराने का प्रचलित मांझ खमाज भी खमाज का एक सुंदर प्रकार है, जिसमें उन्होंने 'अनुराधा' फिल्म के लिए लता मंगेशकर से मर्मस्पर्शी गीत 'कैसे दिन बीते कैसे बीती रतियां, पिया जाने ना' गवाया था। यह कहा जा सकता है कि संगीत प्रेमियों के दिल में बसे हुए कई लोकप्रिय धुनों और भजनों के पीछे राग खमाज की मौजूदगी रही है।

    [उत्तर प्रदेश]