नोएडा। जिले में राजनीति की धुरी रहे एमएलसी नरेंद्र भाटी हाल में समाजवादी पार्टी को छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी नरेंद्र भाटी ने राजनीति में कई उतार चढ़ाव देखे हैं। समाजवादी पार्टी का वह दौर भी देखा जब पार्टी में वरिष्ठ नेताओं की अहमियत थी, पार्टी के फैसलों में उनकी राय मायने रखती थी। पार्टी परिवार की तरह थी, लेकिन पार्टी के मौजूदा हालात ने उन्हें पूरी तरह से निराश कर दिया। आज भी अपने दिल में मुलायम सिंह यादव के प्रति असीम सम्मान रखने वाले नरेंद्र भाटी विधानसभा चुनाव 2022 में भाजपा को मजबूती देने में जुटे हैं। दैनिक जागरण संवाददाता अरविंद मिश्रा ने नरेंद्र भाटी से राजनीति से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के अंश:

आप लंबे समय तक समाजवादी पार्टी से जुड़े रहे, मुलायम सिंह के बेहद करीबी में शामिल रहे, पार्टी छोड़ने की क्या वजह रही?

-नेता जी मुलायम सिंह यादव को मैंने कभी नहीं छोड़ा। आज भी उनके प्रति मन में पूरी श्रद्धा है। नेताजी ने जिस पार्टी को मेहनत से खड़ा किया था, वह पारिवार के अंदरूनी झगड़ों में फंस गई। घर की लड़ाई सड़कों पर आ गई। कार्यकर्ताओं की मेहनत बेकार हो गई। यह देखकर मुझे बहुत कष्ट हुआ।

इसके लिए किसे जिम्मेदार मानते हैं?

-जो पार्टी को संभाल रहे हैं, वही इसके लिए जिम्मेदार हैं। तटस्थ रहते हुए भी मुझे विरोधी धड़े के साथ जोड़ा गया। मैं पार्टी का संस्थापक सदस्य था। खेमेबाजी के कारण पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को अलग-थलग कर दिया। उनका कोई मान सम्मान नहीं बचा है, जिन नेताओं के पास जनाधार है, क्षेत्र में औरा है, उन्हें किनारे कर दिया।

मुलायम सिंह और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी में क्या अंतर है?

-मुलायम सिंह के नेतृत्व की अखिलेश से कोई तुलना नहीं है। मुलायम सिंह खेत खलियान से निकलकर राजनीति में पहुंचे थे। उन्होंने गरीबी को बेहद करीब से देखा था। छात्र, मजदूर, व्यापारी, किसान सभी की चिंता करते थे। उन्हें हर फन का ज्ञान था। पार्टी के हर फैसले में वरिष्ठ नेताओं से सलाह मशविरा करते थे। उन्हें सम्मान देते थे। जानते थे कि पार्टी के लिए कार्यकर्ताओं की क्या अहमियत है। अखिलेश आस्ट्रेलिया से पढ़ कर आने के बाद नेता बने हैं। उन्होंने राजनीति का कोई तजुर्बा नहीं लिया। दो-चार सौ किमी साइकिल चलाकर नेता बन गए। उन्हें नहीं पता कि वोट कहां से निकलता है। इसलिए पार्टी में नेताओं, कार्यकर्ताओं की अहमियत को नहीं समझते। उन्होंने वरिष्ठ नेताओं एवं कार्यकर्ताओं की अनदेखी की। इसका नतीजा पार्टी को 2017 व 2019 के चुनाव में पता लग चुका है। सपा सिंगल हैंड पार्टी हो चुकी है। पार्लियामेंट बोर्ड नहीं बचा है। चुनाव में वरिष्ठ नेताओं से सलाह के बजाए उन लोगों के कहने पर टिकट दिए गए, जिनका राजनीति से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था। अखिलेश की कथनी करनी में अंतर है। पहले उन्होंने मुख्तार अंसारी को पार्टी में शामिल करने का विरोध किया था। आज खुद उनके परिवार को पार्टी में शामिल कर लिया।

सपा विधानसभा चुनाव के लिए कई दलों के साथ समझौते कर रही है, इससे कितना फायदा होगा?

-अखिलेश बकरी के दूध से बाल्टी भरना चाहते हैं, जिले तक सिमटे दलों से समझौता कर उत्तर प्रदेश पर कब्जा नहीं किया जा सकता। जयंत चौधरी के नेतृत्व में यह पहला चुनाव है। वे अच्छे प्रदर्शन के लिए कोशिश कर रहे हैं। शिवपाल के साथ न कोई समझौता होगा और न उसका कोई असर होगा। शिवपाल पहले की शर्त रख चुके हैं कि कद्दावर नेताओं को स्वीकार करना होगा, अखिलेश इसके लिए तैयार नहीं हैं।

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Edited By: Jp Yadav