रामपुर (मुस्लेमीन)। नवाबी दौर से ही रामपुर गंगाजमुनी तहजीब की मिसाल रहा है। यहां के नवाबों ने सभी धर्मों का सम्मान किया। रियासत के आखिरी नवाब रजा अली खां ने तो खुद होली गीत भी लिखे। होली के मौके पर आज भी बुजुर्ग इन गीतों को गुनगुनाते हैं। 

गीत और संगीत का था शौक 

नवाब रजा अली खां को गीत और संगीत का बड़ा शौक था। उनके दरबार में फनकारों की बड़ी कद्र थी। वह खुद भी कला प्रेमी थे। सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देने के लिए सभी धर्मों के त्योहार मनाते। उन्होंने होली गीत भी लिखे, जो उस दौर में बच्चे-बच्चे की जुबान पर रहे। रामपुर रजा लाइब्रेरी में उनका संगीत सागर मौजूद है, जिसमें उनके द्वारा लिखे गए होली गीत भी शामिल हैं। उनके होली गीतों में कन्हैया और गोपियों का भी वर्णन किया गया है। उन्होंने लिखा है, श्याम न आए मोहे चित चोरी, खेलत होली चितवन तोरी। मन पिचकारी भर भर आए, सोये हर दे प्रेम जगाए। रजा पिया सुध लो अब मोरी।

खूब पसंद किया गया गीत 

रामपुर का इतिहास लिखने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता कहते हैं कि उनके लिखे होली गीत आज भी गाए जाते हैं। बुजुर्ग इनका लुत्फ उठाते हैं। नवाब रजा अली खां का यह गीत भी खूब पसंद किया गया। होली की रुत आई री, सजी फिर खेती लहलाई री, नीह पपीहा बोल रहा है, सुंदरता मधुवन पर छाई, होली खेलें राधा कन्हाई। यह गीत भी होली के मौके पर खूब गाया जाता रहा है। फाल्गुन में ब्रजवासी ने लीला रचाई है, हर नार आज रंग गगर भरकर लाई है। आ जाओ अब कन्हैया नहीं गोपियों को चैन, तुम्हरी ही बांट जोहते हैं आज उनके नयन।

किले में होता है होली मिलन

रजा लाइब्रेरी के निदेशक एवं जिलाधिकारी आन्जनेय कुमार ङ्क्षसह कहते हैं कि रामपुर नवाबी दौर से ही सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल रहा है। यहां नवाबों नेे गंगा-जमुनी तहजीब को कायम रखा। सभी धर्मों के लोगों को सम्मान मिला। नवाब रजा अली खां ने होली गीत लिखकर यह संदेश दिया कि उनके दिल में ङ्क्षहदू धर्म के लोगों के लिए भी पूरा सम्मान रहा।

 

Posted By: Narendra Kumar

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