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    50% अमेरिकी टैरिफ से पीतलनगरी की अर्थव्यवस्था 'वेंटिलेटर' पर, कारीगरों का भविष्य अंधकार में

    Updated: Sun, 30 Nov 2025 02:37 PM (IST)

    अमेरिकी टैरिफ के कारण पीतल नगरी की अर्थव्यवस्था संकट में है। 50% टैरिफ लगने से निर्यात प्रभावित हुआ है, कारीगरों का भविष्य अंधकारमय हो गया है। निर्यातक और कारीगर सरकार से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं ताकि अमेरिकी सरकार से बात करके टैरिफ को कम किया जा सके और पीतल उद्योग को बचाया जा सके।

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    बर्तन को तराशता कारीगर

    जागरण संवाददाता, मुरादाबाद। अमेरिका ने भारत के ब्रास-हस्तशिल्प उत्पाद पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के बाद मुरादाबाद की निर्यात इंडस्ट्री प्रभावित हुई है। शहर की पहचान पीतल नगरी इस बार न सिर्फ कारोबार में गिरावट की मार झेल रही है, बल्कि क्रिसमस जैसे बड़े त्योहारी सीजन में भी नुकसान में रही। कई निर्यातकों की सालभर की मेहनत और तैयार माल गोदामों में ही अटका है।

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    आमतौर पर अगस्त से नवंबर तक मुरादाबाद की फैक्ट्रियों के लिए सबसे व्यस्त अवधि होती थी। जिसमें क्रिसमस डेकोरेशन आइटम, कैंडल स्टैंड, लैंप, चांदी कोटिंग वाली सजावटी सामान और ब्रासवेयर के बड़े-बड़े आर्डर इस दौरान अमेरिका व यूरोपीय देशों को आपूर्ति शुरू हो जाती थी। पिछले वर्षों में इस सीजन में कारीगरों को दोहरी शिफ्ट में काम करना पड़ता था, लेकिन टैरिफ लागू होने के बाद विदेशी खरीदारों ने आर्डर रोक दिए।

    जो आर्डर जारी भी थे, उनमें से कई को पुन: शर्तों के साथ कम मात्रा में लिया गया, जिससे उत्पादन यूनिटें आधी क्षमता पर भी काम नहीं कर सकीं। निर्यातकों के अनुसार, टैरिफ बढ़ने से कीमतों में बढ़ोतरी हुई और अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पाद प्रतिस्पर्धा से बाहर हो गए। चीन और वियतनाम जैसे देशों के उत्पादों की कीमत पहले से ही कम है, ऐसे में टैरिफ लगने के बाद भारतीय ब्रासवेयर खरीदारों की पहली पसंद नहीं रह गया।

    कई निर्यातक माल तैयार कर चुके थे, पर अमेरिकी खरीदारों ने कस्टम ड्यूटी बढ़ने का हवाला देते हुए डिलीवरी टाल दी या कीमत घटाने का दबाव बनाया। इस संकट का सबसे ज्यादा असर कारीगरों पर पड़ा है। कई वर्कशाप में मजदूरों की संख्या कम कर दी गई है। जो मजदूर रोजाना दिहाड़ी पर निर्भर थे, वे अब अन्य कामों की तलाश में हैं।

    दर्जनों इकाइयां उत्पादन खर्च न निकल पाने के कारण सीमित दिनों के लिए ही खुल रही हैं। शहर के कई बड़े निर्यातकों ने केंद्र सरकार से राहत पैकेज और विशेष हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय पर वित्तीय और नीति आधारित सहायता नहीं मिली तो मुरादाबाद का पारंपरिक हस्तशिल्प उद्योग लंबे समय तक खड़ा नहीं रह पाएगा।

    स्थानीय उद्योग संगठनों का भी कहना है कि मुरादाबाद के उत्पादों की विशेषता डिजाइन, कारीगरी और हस्तनिर्मित गुणवत्ता है, जो मशीन से बने किसी भी उत्पाद से भिन्न है। ऐसे में सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार वार्ता कर टैरिफ को कम कराने के प्रयास तेज करने चाहिए। निर्यातक अब यूरोप, मध्य एशिया और खाड़ी देशों में बाजार तलाशने की कोशिश कर रहे हैं, पर विशेषज्ञों का कहना है कि नए बाजार विकसित होने में समय लगता है।

    वहीं अमेरिकी बाजार जितना बड़ा और लाभदायक है, उसकी बराबरी कोई दूसरा बाजार नहीं कर सकता। फिलहाल मुरादाबाद की एक्सपोर्ट इंडस्ट्री एक अनिश्चित दौर से गुजर रही है। टैरिफ, घटती मांग और तैयार स्टाक ने मिलकर इस सीजन को पूरी तरह बेकार कर दिया।

     

     

    क्रिसमस को लेकर निर्यातकों के पास आर्डर नहीं हैं। हम लोगों ने विदेश में प्रदर्शनी लगाकर पूरे प्रयास किये हैं। इसमें छोटे निर्यातकों को पांच करोड़ तक इनकम टैक्स छूट मिलने से निर्यातकों को राहत मिलेगी। यह केवल व्यापार का प्रश्न नहीं, बल्कि पांच लाख से अधिक कारीगर परिवार की आजीविका की लड़ाई है।

    - अवधेश अग्रवाल, मुख्य संयोजक ईपीसीएच

     

     

    अमेरिकी टैरिफ ने मुरादाबाद के उद्योग की कमर तोड़ दी है। आर्डर रुके हैं, फैक्ट्रियां ठप हैं और कारीगर बेरोजगारी की कगार पर हैं। ऐसे माहौल में यदि केंद्र या राज्य सरकार पिछले तीन वर्षों के औसत निर्यात कारोबार का 10 प्रतिशत सम्मान निधि के रूप में उपलब्ध करा दे, तो यही इस शहर की सांसें वापस की जीवनरेखा होगी।

    - जेपी सिंह, चेयरमैन यस


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