नैतिक मूल्य भारतीय संस्कृति की पहचान
मुरादाबाद, जासं : यह सत्य है कि अशिष्टता अनैतिकता को जन्म देती है। मानव चरित्र को नैतिकता का पर्याय
मुरादाबाद, जासं : यह सत्य है कि अशिष्टता अनैतिकता को जन्म देती है। मानव चरित्र को नैतिकता का पर्याय कहा जाता है। सत्यवादिता, दयालुता, निष्कपटता, सदाचार, संतोष, पारस्परिक सहयोग, ये सभी नैतिकता के आधार बिंदु हैं। जिस व्यक्ति में ये गुण होंगे, वह निश्चय ही नैतिकता की कसौटी पर खरा उतरेगा। यही नैतिक मूल्य हमारी भारतीय संस्कृति की पहचान हैं। पुरखों से विरासत में मिली अनमोल धरोहर हैं। इसी नैतिकता के कारण भारत की संपूर्ण विश्व में एक अलग पहचान है। बहुत अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आज की हमारी नई और आधुनिक पीढ़ी इस बेशकीमती धरोहर को खोती जा रही है। युवाओं का रुष्ट और रूखा व्यवहार, बड़ों के प्रति अनादर, कुतर्क व मनमानापन यही दर्शाता है कि युवाओं में नैतिक मूल्यों का स्तर किस हद तक गिर चुका है। अशिष्टता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि एक बार किसी विद्यालय के छात्र साइकिल रैली के लिए जमा हुए थे, वहां सम्मानित शिक्षक वर्ग भी उपस्थित था। अचानक विद्यालय का पूर्व छात्र महंगी बाइक से आया और कुछ छात्रों से झगड़ा शुरू कर दिया। जब शिक्षकों ने बीच-बचाव किया तो उन्हें गालियां दीं। यह सब करते हुए उसके चेहरे पर ऐसे भाव उभरे, जैसे ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता हो। न जाने क्या सिद्ध करना चाहता था वह। शिक्षकों का अपमान करके शायद उसे अपनी दबंगई पर अभिमान हुआ होगा। आश्चर्य इस बात पर होता है कि यह सब छोटे से अंतराल में हुआ है। आज से कुछ दशक पूर्व अपने बड़ों का आदर करना, उन्हें उचित प्रेम देना कर्तव्य माना जाता था। लोग मिलनसार थे, रिश्तों में गर्माहट थी, लेकिन अब यह कहते हुए लज्जा आती है कि जिन बूढ़े मां-बाप ने पाल पोसकर बड़ा किया, वही मां-बाप आज बच्चों पर बोझ बन गए हैं। मोबाइल फोन में युवा इतने मग्न रहते हैं कि मेल-मिलाप के लिए वक्त ही नहीं है। आजकल फेसबुक पर बनने वाले रिश्तों के कारण गर्मजोशी का सवाल ही बेमानी है। हमारे देश में नैतिक मूल्यों की रिक्तता देखने को मिल रही है। पश्चिम के अंधानुकरण के कारण हमारी संस्कृति के लुप्त होने का खतरा बढ़ता जा रहा है। हमारी कथनी और करनी में भारी अंतर आ गया है। आज नैतिक मूल्यों की चर्चा केवल पुस्तकों, भाषणों, गोष्ठियों या फिर वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में की जाती है। हम अपने प्राचीन आदर्शो को भूलते जा रहे हैं, जिसके कारण हम स्वयं ही अपने बल, बुद्धि और वैभव को अपने हाथों से खो बैठे हैं। नैतिक मूल्यों का पतन होने का दुष्परिणाम है कि हमारा समाज पतन के गर्त में गिरता जा रहा है। संवेदनहीनता की हद तो इस बात से आंकी जा सकती है कि सड़क पर तड़पते हुए घायल की जान बचाने के बजाए हमारे युवा उसकी दर्दनाक तस्वीर अपने स्मार्ट फोन में कैद करने को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं, ताकि उसे सोशल साइट पर अपलोड कर सकें और बाकी के युवक संवेदनहीनता का स्वांग रचते हुए बड़ी फुर्ती से उस पर लाइक या कमेंट्स करे। आज का युवा वर्ग पल भर में ही वह सब कुछ पाना चाहता है, जो न ही उनके लिए उचित है और न ही उसका अभी वक्त आया है। शराब, पैसा, अय्याशी को हासिल करने के लिए शार्टकट भी अपनाता है। ऐशो-आराम की महत्वाकांक्षा इतनी अधिक बढ़ गई है कि जब भी किसी युवा से पूछा जाता है कि तुम्हारा सपना क्या है तो हर बार यही जवाब मिलता है कि पैसा। जैसे जीवन में सबकुछ पैसा ही हो गया है। इसके लिए कुछ भी कर गुजरने की ललक उनके चेहरों पर साफ झलकती है। समाचार पत्रों के माध्यम से रोज ही ऐसे कितने समाचार पढ़ने को मिलते हैं कि युवा किस हद तक खुद को भुला चुके हैं। सबसे अधिक तकलीफ तो इस बात की होती है कि उन्हें न तो इसकी भनक है और न ही अफसोस। किसी पागल हाथी के समान अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को रौंदते-कुचलते हुए वे आसमानों में उड़ रहे हैं, इस बात से बेखबर कि जब वह जमीन पर गिरेंगे तो कितना बुरा हश्र होगा।
- डॉ. जी कुमार, प्रधानाचार्या, आरएसडी एकेडमी।
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बच्चों का मन बहुत कोमल होता है। शुरुआत से जिस वातावरण में उसका पालन-पोषण होता है, उसका व्यक्तित्व भी उसी प्रकार निखरता है।
- प्रियंका रस्तोगी, शिक्षिका, सेंटमीरा एकेडमी, कांशीराम नगर ब्रांच।
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समाज में बढ़ रहे अशिष्ट आचरण के लिए काफी हद तक परिजन भी जिम्मेदार हैं। उन्हें बच्चों की शैतानी और अभद्र व्यवहार में ही अंतर नजर नहीं आता।
- उमापत शुक्ला, शिक्षक, सेंट मीरा एकेडमी, कांशीराम नगर शाखा।
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समाज में बढ़ते एकल परिवारों का ही असर है कि युवाओं में अशिष्ट व्यक्तित्व का निर्माण हो रहा है। पूर्वजों के आदर्शो का उन्हें अहसास भी नहीं है।
- अर्चना यादव, शिक्षिका, सेंट मीरा एकेडमी, कांशीराम नगर शाखा।
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माता-पिता तो बच्चों की भलाई के लिए बहुत कुछ करते हैं, लेकिन बच्चे कई बार दोस्तों के बहकावे में गलत दिशा में चले जाते हैं।
- शरद प्रताप, छात्र कक्षा दस, आरआरके स्कूल।
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स्मार्ट फोन में ग्रुप के माध्यम से इतनी गंदी सामग्री प्रचारित-प्रसारित की जाती है कि न चाहते हुए भी गलत बातें व्यवहार में आ जाती हैं।
- आकांक्षा सिंह, छात्रा, कक्षा दस, आरआरके स्कूल।
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हॉस्टल में रहने वाले छात्र-छात्राओं के दोस्त युवाओं को भटकाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नशे, अवसाद आदि के मामले में हॉस्टल का नाम सबसे पहले आता है।
- निधि झा, छात्रा, कक्षा दस, आरआरके स्कूल।
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