मेरठ, [रवि प्रकाश तिवारी]। मुंह पर कपड़ा, हाथों में पत्थर और व्यवस्था के खिलाफ नारेबाजी करते 20-30 के बीच की उम्र वाले लड़के। कभी पत्थरबाजों की यह तस्वीर कश्मीर में आम थी लेकिन शुक्रवार को मेरठ की सड़कें भी ऐसी घटनाओं की गवाह बनीं। भीड़ के बीच से निकलते कुछ ऐसे चेहरों ने शहर के मिजाज को पूरी तरह से बदरंग कर दिया। देखते ही देखते सड़कों पर व्यवस्था तार-तार हुई और आधा शहर हिंसा की चपेट में आ गया। दोपहर बाद से शुरू हुई अराजकता देर शाम तक पसरी रही।

पुलिस-प्रशासन की घेराबंदी

मेरठ ने पिछले दशकभर में अपने ऊपर दंगों के पुराने दाग को धो दिया था। छिटपुट घटनाओं को छोड़ शहर अमन पसंद बना था, लेकिन जिस तरह से उपद्रवियों ने नियोजित ढंग से पुलिस को निशाना बनाया और व्यवस्था को चुनौती दी, वह रणनीति के बगैर संभव नहीं। शुक्रवार को खाकी से बलवाईयों ने गुरिल्‍ला वार किया। हर जगह पुलिस-प्रशासन की घेराबंदी की गई। बात लिसाड़ीगेट से भूमिया के पुल होते हुए खत्ता रोड, तारापुरी तक की करें तो जिस तरह से पुलिस को बलवाईयों ने घंटों छाक-छकाया, वह आम शहरी या सामान्य नागरिक के बस की बात नहीं।

तंग गलियों का आतंक

पुलिस के असलहों का लगातार मुकाबला दोपहर से शाम तक होना इस बात की गवाही है कि लड़ने के लिए हथियारों की तैयारी पहले से थी। एक ही समय पर दो-तीन जगहों पर पुलिस पर पहले पथराव और फिर तंग गलियों में खींच लेने की उनकी रणनीति में खाकी हर बार फंसी। लिसाड़ीगेट में, तारापुरी में, जाकिर कालोनी, सिटी अस्पताल और इस्लामाबाद में भी। यह इसलिए किया गया ताकि पुलिस बल बंट जाए और उपद्रवी खाकी पर हावी हो सकें। हुआ भी ऐसा ही।

उपद्रवी पूरी प्लानिंग से थे

उपद्रवियों को खदेड़ने के क्रम में कई बार ऐसा हुआ कि पुलिस बीच में हो गई और बलवाई आगे-पीछे। लिसाड़ीगेट, खत्ता रोड, हापुड़ रोड हर जगह अफसरों को पहली बार में तो पांव पीछे खींचने पड़े। बाद में बढ़ती संख्या में दोबारा धावा बोलकर हालात को काबू में किया। हापुड़ रोड पर रंगरूटों का बवालियों के घेरे में आ जाना भी इस बात का गवाह है कि उपद्रवी पूरी प्लानिंग से थे और पुलिस उनके पीछे बस भाग रही थी। मुस्लिम पक्ष में सुबह से ही हंगामे-बवाल की आशंका थी, इसलिए दुकानें खुली ही नहीं। यह भी पुलिस के लिए बड़ा संकेत था लेकिन पुलिस ने इस पर वर्क नहीं किया।

पहले से तैयारी होती तो न जलता शहर

अब तक ड्रोन उड़ाकर माहौल भांपने वाली पुलिस ने इस बार यह तरकीब भी नहीं अपनायी। अंजाम सामने है कि जब बलवाईयों को खदेड़ते हुए पुलिस मोहल्लों में घुसी तो छत से पत्थर और गोली बरसी। यानी छतों पर पत्थरों का भी पहले से इंतजाम था। कई हलकों में फोर्स की कमी भी चर्चा में रही जबकि आरएएफ की पूरी 108 बटालियन यहीं है। पीएसी की छठी और 44वीं वाहिनी भी मेरठ में है। शाम को जब हालात बेकाबू होने लगे तो आरएएफ की एडिशनल फोर्स बुलाई गई, पीएसी के कप्तानों को आला अधिकारियों ने मेरठ में हालात संभालने को कहा। अगर यह तैयारी पहले ही हो जाती तो शायद मेरठ इतना नहीं जलता, जितना आज जला। 

Edited By: Prem Bhatt

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