प्रदीप द्विवेदी, मेरठ। UP Nagar Nikay Chunav इस बार नगर निकाय चुनाव सत्ताधारी दल भाजपा के लिए जितनी चुनौती लेकर आ रहा है उससे कहीं ज्यादा यह सपा के लिए साख का मामला बनेगा। 2017 में बसपा की सीट से महापौर बनीं सुनीता वर्मा वर्तमान में सपा में हैं, इसलिए कभी अपने सिंबल से महापौर की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाने वाली सपा के सामने इस पद को बरकरार रखने के लिए सबसे बड़ी परीक्षा से गुजरना होगा। अन्यथा बसपा हमेशा राजनीतिक तंज से चिढ़ाती रहेगी।

तेजी से उभरी सपा के लिए चुनौती

विधानसभा चुनाव में सात में से सपा के चार विधायक बने, इसलिए मेरठ में तेजी से उभरी सपा के लिए यह और भी कठिन चुनौती और साख का चुनाव होगा उन्हें यह दिखाना होगा कि उन्हें जनता ने जिस तरह से विधानसभा में तवज्जो दी उसी तरह से महापौर, पार्षद से लेकर नगर पालिका व नगर पंचायत अध्यक्ष पदों पर भी स्वीकारी गई। यदि सपा इस चुनाव में बेहतर प्रदर्शन कर लेती है तो वह भाजपा के लिए 2024 में मुश्किलें खड़ी करने का दम भर पाएगी यदि प्रदर्शन पहले की ही तरह बुरा रहा तो 2024 के लिए उनके चारों विधायकों की जीत की समीक्षा जनता और भाजपा नए सिरे से करने लगेगी।

रालोद से गठबंधन की स्थिति में सीटों के बंटवारे में फंसेगा पेंच

2017 में अलग-अलग चुनाव लड़ने पर कुल 90 वार्डों में से सपा के चार पार्षद और रालोद से एक पार्षद जीत सके थे, दोनों की स्थिति दयनीय रही फिर भी रालोद कई सीटें चाहेगी। यही स्थिति नगर पालिका और नगर पंचायत में थी। रालोद सिवालखास और सपा सरधना नगर पंचायत अध्यक्ष का ही पद पा सकी थी। दोनों यहां भी धराशायी थे लेकिन इस बार दोनों पार्टियां नए जोश और नई उम्मीद लेकर मैदान में हैं। गठबंधन से चुनाव लड़ने का ताना-बाना बुना जा रहा है, इसलिए रालोद कई सीटों पर अपनी दावेदारी पेश करेगी, तीन वर्तमान विधायक और कुछ पूर्व विधायक अपनी लाबिंग में जुटेंगे। क्‍योंकि दोनों दल इससे पहले स्वतंत्र चुनाव लड़ा करते थे।

महापौर टिकट पर सपा के अंदर ही मचेगा घमासान

रालोद से गठबंधन होने पर भी महापौर सीट सपा के खाते में रहेगी। आरक्षण ने यदि पूरी तरह से रास्ता बंद नहीं किया तो योगेश वर्मा अंत तक इस पद के लिए आजमाइश करेंगे। 2017 में सुनीता के सामने सपा के टिकट से चुनाव लड़ चुकीं दीपू मनोठिया व उनके पति विपिन मनोठिया फिर से टिकट लेने के लिए अभी से लाबिंग में हैं। जिन नेताओं को विधायक या सांसद का टिकट नहीं मिल पाया था वे महापौर के टिकट के लिए खुलकर सामने आएंगे। महत्वपूर्ण सीट पर सपा के चारों विधायक अपने-अपने पक्ष के दावेदार के लिए अंदरखाने पैरवी करेंगे।

टिकट दिलाने के लिए पैंतरेबाजी

रालोद से गठबंधन की स्थिति में रालोद के नेता भी अपने करीबी को सपा से टिकट दिलाने के लिए पैंतरेबाजी करेंगे। शहर सीट से सपा के वर्तमान विधायक रफीक अंसारी 2012 में सपा के समर्थन से चुनाव लड़े थे, तब भाजपा के हरिकांत अहलूवालिया जीते थे। अब वह दो बार से विधायक हैं ऐसे में अपना दबदबा दिखाने के लिए किसी अपने के लिए समीकरण बनवाने का प्रयास करना चाहेंगे।

आरक्षण तय करेगा सपा का भविष्य

2017 में सुनीता वर्मा के लिए दलित-मुस्लिम समीकरण जिताऊ बने थे। तब उस समय पूर्व मंत्री याकूब कुरैशी का भी सुनीता की जीत में योगदान माना गया था। अब सुनीता सपा में हैं, इसलिए अगर आरक्षण ने खेल नहीं बिगाड़ा तो वह फिर से प्रत्याशी बनने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाएंगी। या फिर उनके पति योगेश वर्मा स्वयं भी मैदान में आना चाहेंगे। हालांकि पूरा दारोमदार आरक्षण पर टिका हुआ है। यदि अनुसूचित जाति या अनुसूचित महिला का आरक्षण नहीं हुआ तो योगेश परिवार के सामने चुनौती होगी। साथ ही सपा को भी नई रणनीतिक चाल साधनी पड़ेगी।

महापौर, पार्षद, पालिका पंचायतों की स्थिति

2006 : महापौर पद पर लीलावती की जमानत जब्त हुई। 10 पार्षद बने। नगर पंचायत लावड़ पर जीत।

2012 : सपा के समर्थित महापौर प्रत्याशी रफीक अंसारी हारे। चार पार्षद बने।

2017 : सपा की महापौर प्रत्याशी दीपू मनोठिया हारीं। चार पार्षद बने। सरधना नगर पालिका पर जीत हुई थी। 

Edited By: Prem Dutt Bhatt