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    छुट्टियों में चले आइए मेरठ के हस्तिनापुर, अनोखा है जैन मंदिरों का आकर्षण, पढ़िए यहां पहुंचने का रूट

    By Prem Dutt BhattEdited By:
    Updated: Sun, 14 Aug 2022 02:19 PM (IST)

    Hastinapur तीन धर्मों से जुड़ी आस्था देखने के लिए महाभारत कालीन नगरी मेरठ के हस्तिनापुर चले आइए। यहां पर प्राचीन कुरूवंश के आराध्य देव भगवान शिव का पांडेश्वर मंदिर है। इसके अलावा भी कई स्‍थल यहां पर आने वालों का मन मोह लेते हैं।

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    Hastinapur Meerut महाभारत कालीन नगरी हस्तिनापुर में देखने के लिए कई रमणीय स्‍थल हैं।

    मेरठ, जागरण संवाददाता। Hastinapur News पौराणिक ऐतिहासिक महाभारत कालीन नगरी हस्तिनापुर का कुरुवंश से ही अपना विशेष महत्व है। लेकिन साथ ही जैन तीर्थ क्षेत्र के रूप मे पूरे विश्व में अपनी अमिट पहचान बना चुकी है। यहां स्थित सुंदर व आकर्षक जैन मंदिरों की बड़ी श्रृंखला स्वत: ही पर्यटकों को अपनी आकर्षित करती हैं और प्रतिदिन यहां इन मंदिरों की अनूठी कला कृतियों को देखने के लिये हजारों लोग पहुंचते हैं।

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    पर्यटकों को लुभाता है यहां का वातावरण

    वहीं चंद दूरी पर ही बह रही गंगा मैया व हरा भरा पर्यावरण बाहर से आने वाले पर्यटकों को लुभाता है। इस बार छुट्टियों में आप परिवार के साथ यहां पर मनोरम दृश्‍यों से रूबरू हो सकते हैं। हिंदू धर्म, जैन धर्म एवं सिख धर्म के समागम की स्थली हस्तिनापुर को विश्व में जाना जाता है।

    कैसे पहुंचे हस्तिनापुर

    हस्तिनापुर मेरठ जनपद मुख्यालय से लगभग 40 किमी दूरी पर स्थित है। भैंसाली डिपो से एसी व नानएसी बसों से हस्तिनापुर पहुंच सकते हैं। जबकि पर्यटक अपने वाहनों से मेरठ पौड़ी मार्ग से होते हुए वाया मवाना होते हुए हस्तिनापुर पहुंच सकते हैं। इसके बाद आसपास घूमने के लिए पर्यटक टेंपो व तांगे का सहारा ले सकते है।

    तीन धर्मों की जुड़ी आस्था

    हिंदू धर्म, जैन धर्म एवं सिख धर्म के समागम की स्थली हस्तिनापुर को विश्व में जाना जाता है। जहां एक ओर महाभारत कालीन मंदिरों की विशेषता है वहीं जैन धर्म के मंदिरों की लंबी श्रृंखला होने के साथ साथ पंज प्यारे भाई धर्म सिंह की जन्म स्थली होने का गौरव भी इस धरती को प्राप्त है। जैन धर्म के कुल 24 तीर्थंकरों मे से 16वें, 17वें व 18वें तीर्थंकर शांतिनाथ, कुंथुनाथ व अरहनाथ का जन्म इसी पावन धरती पर हुआ था। उनके चार चार कल्याणक भी इसी धरती पर होने से क्षेत्र महत्व और बढ़ जाता है। भव्य मंदिरों के दर्शन से आत्मिक सुख की अनुभूति होती है।

    ये स्‍थान हैं देखने योग्‍य

    प्राचीन पांडेश्वर महादेव

    प्राचीन एवं महाभारत कालीन कुरूवंश के आराध्य देव भगवान शिव का पांडेश्वर मंदिर है। जिसमें प्राचीन शिवलिंग स्थापित है और प्रांगण में खड़े दो प्राचीन विशाल बरगद व पीपल के वृक्ष पांडवो व कौरवों की क्रीडा तथा श्री कृष्ण के अद्भुत सौंदर्य के प्रत्यक्ष दर्शन की अनुभूति कराते है। जनश्रुति के अनुसार यहीं से बहने वाली गंगा मैया मे स्नान कर पांडव शिवलिंग की पूजा अर्चना करते थे। मंदिर के चारो और ध्यान योग व मनन चिंतन, जप व तप करने के हेतु गुफाएं स्थापित है।

    विदुर टीला

    पांडेश्वर मंदिर के समीप ही विदुर टीला स्थित है। जहां भगवान कृष्ण कौरवो व पांडवों को युद्ध न करने के लिए समझाने आए थे। महाभारत कालीन मुख्य टीला भी काफी क्षेत्र में फैला हुआ है।

    श्री कर्ण मंदिर

    कर्ण मंदिर पौराणिक स्थल है। यह वही सिद्ध स्थान है जहां पर दानवीर कर्ण सवा मन सोना गरीबों में रोज दान करते थे तथा इसी स्थान पर कर्ण ने अपने कवच और कुंडल भगवान इंद्र को दान किए थे। वहीं प्राचीन द्रोपदेश्वर मंदिर, द्रोण कूप व द्रोपदी घाट एवं पितामह भीष्म का माता गंगा से मिलने का स्थान भी मौजूद है।

    ऐतिहासिक गुरुद्वारा की भी अलग पहचान

    हस्तिनापुर की धरती केवल महाभारत या जैन धर्म की भूमि ही नही है वरन् यहां की प्रत्येक रजकण में सर्वधर्म सद्भाव की गूंज सुनाई देती है। एक और जहां जैन धर्म की सुगंध आती है वहीं हिंदू धर्म की पौराणिक स्थलों के अवशेष है और इससे लगभग कुछ दूरी पर ही सैफपुर गांव मे सिखों के पंज प्यारे भाई धर्म सिंह का गुरुद्वारा भी स्थित है। जो पूरे विश्व में सिख धर्म की आस्था का केंद्र है और प्रत्येक माह की अमावस्या को जोड़ मेला आयोजित होता है। इसके अलावा भी अन्य पर्वों पर विशेष कार्यक्रम आयोजित होते है।

    पांडव टीला व राजा रघुनाथ महल

    पांडव टीला पर राजा रघुनाथ महल स्थित है। इस महल की यादें देश की आजादी के पूर्व से जुड़ी है। देश के क्रांतिकारियों ने इस महल की गुफाओं में रहकर ही आजादी का ताना बाना बुना था। आजादी के लड़ाई के दौरान देश के पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्त्री ने भी इसी महल से क्रांतिकारियों का नेतृत्व किया था।

    श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर

    प्रवेश करते ही 31 फीट उंचा मानस्तंभ बना है जिसके चारो और जिन मंदिर है और बीच मे मुख्य मंदिर है मंदिर मे केवल एक ही वेदी है जिसके तीन दरवाजे हैं, श्वेत पाषाण से निर्मित मूलनायक भगवान शांतिनाथ की पद्मासन प्रतिमा है दायीं और भगवान अरहनाथ व बायीं ओर कुंथुनाथ की प्रतिमा है। श्री पार्श्वनाथ मंदिर, श्री नंदीश्वर द्वीप,अरहनाथ जैन मंदिर, नेमिनाथ मंदिर, आदिनाथ जिनालय, तीन मूर्ति मंदिर, समवशरण आदि की श्रंखला स्थापित है।

    कैलाश पर्वत की संरचना है अद्भुत

    कैलाश पर्वत अद्भुत अनूठी कला निर्मित है। जिसमें भूत, वर्तमान व भविष्य काल की तीन चौबीसी, 72 मंदिर व 51 फीट वाले शिखर युक्त मंदिर में सवा ग्यारह फीट की भगवान आदिनाथ की पद्मासन प्रतिमा विराजमान है।

    जंबूद्वीप स्थल है मनमोहक

    पूज्य ज्ञानमती माता जी वर्ष 1974 में उनका पदार्पण इस धरती पर हुआ और एक नए इतिहास की रचना प्रारंभ हुई। 250 फुट के व्यास में सफेद और रंगीन संगमरमर पत्थरों से निर्मित जैन भूगोल की अद्वितीय वृत्ताकार जम्बूद्वीप रचना का निर्माण हुआ। इसके बीच 101 फीट ऊंचा सुमेरू पर्वत अपनी ओर आकर्षित करता है। कमल मंदिर, पर परमेष्ठी मंदिर, तेरह द्वीप रचना, तीन मूर्ति मंदिर, तीन लोक रचना सहित मंदिरों की कतार है। ध्यान मंदिर आध्यात्मिक सौहार्द से ओत प्रोत है।

    श्री श्वेतांबर जैन मंदिर

    यह मंदिर वर्ष 1870 में बना था। इसमें राजा श्रेयांस कुमार द्वारा प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव को आहार देते हुए प्रतिमा प्रतिष्ठित है। भगवान शांतिनाथ कुंथु व अरहनाथ की गर्भ, जन्म, दीक्षा और केवल ज्ञान के 12 कल्याणकों के भव्य चित्रपट संगमरमर की दीवारों पर स्थापित है। वहीं अष्टापद तीर्थ भी श्रद्धालुओं को अपनी ओर आने को मजबूर करता है। 

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