निराला जी रखते थे होमवती देवी के प्रति आदर भाव
अपनी रचनाओं से हिंदी साहित्य जगत में छा जाने वाली होमवती देवी को उनके अपने ही शहरवासियों ने मानों बिसरा दिया है।
मेरठ, जेएनएन। अपनी रचनाओं से हिंदी साहित्य जगत में छा जाने वाली होमवती देवी को उनके अपने ही शहरवासियों ने मानों बिसरा दिया है। जीवनकाल में उनके संपर्क में आए हिंदी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय ने उनके निधन के बाद उनकी रचनाओं पर आधारित पुस्तक का संपादन किया। उनकी प्रसिद्ध कहानी गोटे की टोपी पर सिंदूर नाम से एक फिल्म भी बनी थी। इसके बावजूद साहित्य जगत में वह सम्मान उन्हें हासिल न हुआ जिसकी वह हकदार रहीं।
आज होमवती देवी का जन्मदिवस है, लेकिन मेरठ के साहित्यिक जगत में कहीं कोई हलचल नहीं। साहित्यिक गोष्ठियों में उनकी कोई चर्चा नहीं। होमवती देवी का जन्म 20 नवंबर 1902 को हुआ था। उनका विवाह मेरठ के ही डा. चिरंजीलाल से हुआ, लेकिन कुछ समय बाद ही पति का निधन हो गया। वैधव्य से उपजी पीड़ा और खालीपन ने उन्हें साहित्य सृजन के लिए प्रेरित किया। मेघदूत चौराहे से कचहरी की ओर बढने पर कोठियों का जो सिलसिला चलता है, वहा कभी पर्ण कुटी नाम से एक विशाल हवेली हुआ करती थी। यही होमवती जी का निवास था, जहा कभी साहित्यिक गोष्ठियों की गंगा बहती थी। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय ने बसंत के अग्रदूत लेख में लिखा है कि सन 1940 के आसपास हिंदी साहित्य परिषद की अध्यक्ष थीं होमवती देवी। मेरठ में आयोजित साहित्य सम्मेलन में महाकवि सूर्यकात त्रिपाठी निराला ने उनका आतिथ्य स्वीकार किया था। लेख में निराला जी का होमवती के प्रति आदर भाव का भी जिक्र है। उस साहित्य सम्मेलन में शिवमंगल सिंह सुमन, प्रभाकर माचवे, भारत भूषण अग्रवाल, जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार आए थे।
उन दिनों आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, हरिवंश राय बच्चन, भगवती चरण वर्मा, जैनेंद्र, जैसे दिग्गज रचनाकारों के व्याख्यानों से मेरठ की धरा ओतप्रोत रहती थी। कलम के मामले में काल की सीमाओं को लाघती होमवती देवी कहानिया और कविताएं दोनों लिखती थीं। उन्?हें पश्चिम उप्र की महादेवी वर्मा कह कर बुलाया जाता है। महादेवी वर्मा की तरह ही उनकी कविताओं में भी वेदना और करुणा झलकती है। एनएएस डिग्री कालेज में हिंदी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डा. प्रज्ञा पाठक बताती हैं कि होमवती देवी का साहित्यिक व्यक्तित्व ऐसा था कि उन्हें किसी उपमा की जरूरत नहीं है। उनके समय में मेरठ हिंदी साहित्य की गतिविधियों का केंद्र हो गया था। दिल्ली विश्ववि़द्यालय में हिंदी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डा अल्पना मिश्रा ने समीक्षा में लिखा है कि होमवती जी की नारी पात्र प्रधान कहानिया सामाजिक रुढियों का सामना करते हुए पाबंदियों के खिलाफ और अधिकारों के लिए आवाज उठाती नजर आती हैं। सनद रहे कि यह रचनाएं ऐसे समय लिखी गईं कि जब एक आम महिला के लिए इस तरह सोचना भी कठिन था। उनकी कहानी उत्तराधिकारी में उठाई गई समस्या आज भी हमारे समाज में मौजूद है। कम उम्र की लड़कियों का अधिक उम्र के पुरुषों से विवाह, और आपसी संबंध इस कहानी में बेहद शालीनता से परोसा गया है। यह कहानी आज की महिला की सोच से भी आगे खड़ी दिखाई देती है। इसी तरह गोटे की टोपी में कम उम्र में विधवा हुई लड़की की दर्द और संघर्ष भरी कहानी है। जीवन परिचय
- जन्म : 20 नवंबर 1902
- निधन : तीन फरवरी 1951
- पिता : रामनाथ, निवासी पत्थरवालान
- माता : कुंदनी देवी
- पति : डा. चिरंजीलाल
- कहानी संग्रह : निसर्ग धरोहर, स्वप्नभंग, अपना घर
- काव्य संग्रह : अर्घ, उद्गार, प्रतिच्छाया, अंजलि के फूल।
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