मेरठ, [दिलीप पटेल]। Jagran Special Column कोरोना जैसी महामारी को फैलने से रोकने के लिए शहर की सड़कें ब्लीचिंग से तर हो गई हैं। सुबह-शाम जलकल विभाग के टैंकर और सीवर जेटिंग मशीनें छिड़काव करते हुए दिख जाएंगी लेकिन यह तब संभव हो पा रहा है जब शहर में पर्याप्त पानी की उपलब्ध्ता है। जरा कल्पना कीजिए उन शहरों की जो पानी के संकट से गुजर रहे हैं और कोरोना जैसी महामारी के दौर से भी..। वहां क्या मेरठ सरीखे ब्लीचिंग घोल का छिड़काव हो रहा होगा, शायद नहीं। इस आपदा से लोगों को अब सबक लेने की जरूरत है कि जल संरक्षण हर हाल में करना है क्योंकि कोरोना जैसी महामारी कभी भी फैली तो दवा से ज्यादा पानी की जरूरत होगी। जल ही जीवन है। नगर निगम प्रतिदिन 50 हजार लीटर पानी में ब्लीचिंग का घोल मिला कर छिड़काव कर रहा है ताकि वायरस संक्रमण को खत्म किया जा सके।

जाएं तो जाएं कहां

कोरोना वायरस के लॉकडाउन के बाद दिहाड़ी मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट ही नहीं खड़ा हुआ है बल्कि उनको एक अदद आसरे की भी तलाश है। शहर में छोटे-छोटे समूहों में मजदूर सड़कों पर भटक रहे हैं। केंद्र सरकार ने तो कह दिया कि जो जहां है, वहीं रहेगा लेकिन सड़क पर भटकने वाले मजदूर कहां जाएं। उनके आश्रय की समुचित व्यवस्था ही नहीं की गई है। महामारी की आपदा से निपटने को कागजी प्लान है। कहीं भोजन के पैकेट तो कहीं राशन बांट कर जिम्मेदारियों से इतिश्री की जा रही है। शहर में चार बड़े और 12 छोटे रैन बसेरे हैं, जो खाली पड़े हैं। कोरोना जैसी महामारी के वक्त इन आश्रय स्थलों पर शहर में सड़क पर घूम रहे निराश्रितों और मजदूरों को रोका जा सकता है। यहां पर उन्हें क्वारांटाइन कर कोरोना का संक्रमण फैलने से रोका जा सकता है।

गायब हो गई पॉलीथिन

कुछ दिन पहले तक इसी शहर में सड़कों, चौराहों, बाजारों और खुले नाले-नालियों में पॉलीथिन के ढेर दूर से दिखलाई पड़ते थे। नगर निगम का प्रवर्तन दल दिनभर प्रतिबंधित पॉलीथिन को जब्त करने के लिए दौड़ लगाता था। ..लेकिन कोरोना वायरस के प्रकोप के बीच लोगों ने पॉलीथिन से दूरी बना ली है। दरअसल, पॉलीथिन में कोरोना वायरस 72 घंटे तक जीवित रहता है। यह मैसेज लोगों तक पहुंचा तो जिंदगी की खातिर पॉलीथिन का इस्तेमाल बंद कर दिया गया। इस बात की चर्चा नगर निगम के सफाई अमले के बीच जोरों पर है। दरअसल, लोग पॉलीथिन का उपयोग कर सड़क पर कचरे के साथ फेंक देते थे। यह पर्यावरण के लिए नुकसानदायक होने के साथ ही गंभीर बीमारियों को भी जन्म देती है। बड़े-बड़े अभियान चलाए गए लेकिन बेअसर रहे। हालांकि, जब जान पर ही बन आई तो लोगों ने खुद ही आदतें सुधार लीं।

बदली सफाई की तस्‍वीर

शहर में सफाई को लेकर अक्सर हाय तौबा मचती थी। प्रमुख मार्गों पर 140 से ज्यादा अस्थाई खत्ते परेशानी के सबब हुआ करते थे। वही शहर है, वही नगर निगम। बस कोरोना वायरस की दस्तक नई है। लोगों के जीवन पर संकट आया तो नगर निगम के सफाई अमले ने झाड़ू उठा ली। फावड़ा पकड़ लिया और सारे संसाधन लगा दिए गए। कुछ दिन पहले तक जो सड़कें गंदगी से अटी पड़ी थीं, उन सड़कों पर सफाई और अब चूने व रंग की आकर्षक सजावट नजर आ रही है। यह सिर्फ इच्छा शक्ति का प्रदर्शन है। हालांकि लोग घरों में मौजूद हैं। बाजार बंद हैं तो कचरे का उत्सर्जन भी कम हुआ है। नगर निगम अफसर भी कह रहे हैं कि कोरोना का प्रकोप कम होने पर भी ऐसी ही सफाई रखने की अब चुनौती होगी क्योंकि लोग सफाई को लेकर पहले से कहीं ज्यादा संजीदा होंगे। 

Posted By: Prem Bhatt

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