1854 में निर्मित इस नहर के जरिए आज भी मेरठ से पहुंच सकते हैं कानपुर और वहां से प्रयागराज, ये हैं इसकी विशेषताएं
दुनिया में जितनी नहरें बनी हैं उन्हें या तो सिंचाई या जल परिवहन के लिए डिजायन किया गया है लेकिन ऊपरी गंगा नहर में दोनों कार्य हो सकते हैं। इस नहर में कभी भी पानी का भराव नहीं हुआ है न ही मुख्य कैनाल की कभी सफाई की गई है।

मेरठ, ओम बाजपेयी। पश्चिम उत्तर प्रदेश की जीवन रेखा मानी जाने वाली ऊपरी गंगा नहर हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग का अद्वितीय नमूना है। 16 अप्रैल 1842 को अपर गंगा कैनाल के सुपरीटेंडिंग इंजीनियर सर प्रोबी कोटले द्वारा इस नहर का निर्माण आरंभ कराया गया था।
1854 में बनकर तैयार हुई थी अपर गंगा कैनाल
1854 में यह नहर बन कर तैयार हुई तो गंगा यमुना के बड़े भू भाग को सिंचित करने के साथ इससे कानपुर तक जल परिवहन भी संभव हो गया था। इसका यह अनछुआ पहलू है कि जल परिवहन के लिए डिजायन किया गया सिस्टम आज भी सिस्टम अस्तित्व में है। नौकायान द्वारा ऊपरी गंगा नहर के जरिए भी कानपुर और वहां से प्रयाग पहुंचा जा सकता है। भारत में ही नहीं विश्व में जितनी नहरें बनी हैं उन्हें या तो सिंचाई या जल परिवहन के रूप में डिजायन किया गया है पर ऊपरी गंगा नहर ऐसी है जिसमें दोनों कार्य हो सकते हैं।
प्रत्येक फाल पर बना है नेवीगेशन सिस्टम
अमेरिका में आयोजित वर्ल्ड कैनाल काफ्रेंस में अपना अध्ययन पत्र प्रस्तुत करने वाले इंडियन वाटर रिसोर्सेज सोसायटी मेरठ चेप्टर के अध्यक्ष एसके कुमार ने बताया कि ऊपरी गंगा नहर को बनाते समय इसके ढ़लान को नियंत्रित करने के लिए आठ स्थानों पर फाल (अधिक ऊंचाई से पानी को नीचे उतारने के लिए) बनाए गए थे। सभी फालों पर नेवीगेशन सिस्टम भी बनाया गया था। इस सिस्टम से तात्पर्य है कि अगर यात्रियों या माल को लेकर कोई बोट आ रही है तो उसे ऊंचाई से नीचे कैसे लाया जाएगा। भोला की झाल में छोटी कैनाल निकाली गई है, जिसमें एक गेट नीचे की स्ट्रीम में और दूसरा गेट अप स्ट्रीम में है। इन दोनो गेटों को इस प्रकार समायोजित किया जाता है कि नौका पानी के बहाव के साथ नीचे की स्ट्रीम में पहुंच जाती है। सिंचाई विभाग के पूर्व मुख्य अभियंता एसके कुमार ने गंगा कैनाल क्लासिकल इनलैंड वाटर ट्रांसपोर्ट सिस्टम विषय पर प्रेजेंटेशन में इस तथ्य को बखूबी दर्शाया तो अमेरिकन भी भारत की इस कैनाल के सिस्टम का लोहा मान गए।
मुख्य नहर की आज तक नहीं हुई सफाई, 1916 का फोटो में दिखती हैं नौकाएं
नहर का एलाइनमेंट इस तरह किया गया है आज तक नहर में कभी भी पानी का भराव नहीं हुआ है न ही मुख्य कैनाल की कभी सफाई की गई है। सिंचाई और नौका परिवहन के लिए सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि नदी या जलमार्ग का ढ़लान ज्यादा नहीं होना चाहिए। अधिक ढ़लान होने पर पानी का तेज प्रवाह तली और नदी कटाव करेगा और कम प्रवाह होगा तो टेल तक पानी नहीं पहुंचेगा और सिल्ट का जमाव होगा। इस नहर के आठ फाल हैं। 1916 के एक फोटो में नहर किनारे नौकाएं देखी जा सकती हैं।
माल ढुलाई और स्टीमर संचालन के लिए उपयुक्त
नेशनल वाटर वेज डेवलपमेंट अथारिटी ने ऊपरी गंगानहर में नेवीगेशन और मालढुलाई की योजना का खाका बनाया था। सर्वे में क्लास टू श्रेणी के जल परिवहन के लिए नहर को उपयुक्त माना गया था। इसके तहत इसमें 75 लोगों की क्षमता वाले स्टीमर और 300 टन माल ढ़ोने वाली नौकाएं चलाई जा सकती हैं।
इन्होंने कहा
भोला की झाल पर तीस मीटर लंबा और 15 मीटर चौड़ा चैनल बना है, जिसमें दो गेट हैं। आजादी के पूर्व तक नहर का प्रयोग माल ढुलाई के लिए होता था।
नीरज कुमार, अधिशासी अभियंता, निर्माण खंड मेरठ गंगा नहर
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