मेरठ, जेएनएन। अहोई अष्टमी का व्रत माताएं संतान की लंबी उम्र और खुशहाली के लिए रखती हैं, फिर चाहे बेटा हो या बेटी। बदलती मानसिकता ने कई परंपराओं और मान्यताओं को भी बदला है। एक समय माना जाता था कि यह व्रत माताएं वंश को आगे बढ़ाने वाले बेटों की लंबी उम्र के लिए रखती हैं, समय के साथ लोगों की सोच बदली और आज बेटे और बेटी में कोई अंतर नहीं है। बेटियां माता पिता का सहारा बन रही हैं, और शिक्षा प्राप्त कर उनका नाम रौशन कर रही हैं। इसलिए बेटा व बेटी में अंतर न करते हुए माताएं दोनों ही संतानों की मंगल कामना करते हुए आज अहोई अष्टमी का व्रत रखेंगी।

अहोई अष्टमी व्रत पर दोनों बच्चे बेटी पृथिका और बेटा पीयूष पूजा के बाद पानी पिलाकर व्रत खुलवाते हैं, और उपहार भी देते हैं। इस व्रत को पारंपरिक तरीके से मनाया जाता है। इस दिन बिना काटे ही खाना तैयार किया जाता है। मान्यता है कि अहोई अष्टमी पर माताओं को कुछ भी काटकर नहीं खाना चाहिए।

- डा. पूनम सिंह, अजंता कालोनी

बेटी शिवांशी तीन माह की है, और यह मेरा पहला अहोई अष्टमी का व्रत है। जिसके लिए मैं काफी उत्साहित हूं। पहली बार अहोई अष्टमी व्रत रखने पर अहोई भरी जाती है। इसमें मिट्टी के बर्तनों को भरकर रखा जाता है, और मां चांदी के मोतियों की माला पहनती है। शाम को कथा सुनने और तारों को अ‌र्घ्य देने के बाद पहली अहोई पर पांच या 11 लोगों को कपड़े देने का रिवाज है। मैं अपना पहला अहोई अष्टमी का व्रत पूरे रीति रिवाज से करूंगी।

- स्वाति धामा, पल्लवपुरम

बेटी गिन्नी दो साल की है, और मैं दो साल से अहोई अष्टमी का व्रत उसके लिए रख रही हूं। बेटों से अधिक बेटियां मां के दिल के करीब होती हैं। बेटियां घर की रौनक होती हैं। इसलिए बेटे और बेटी में अंतर नहीं किया जा सकता है। मेरे लिए बेटों से बढ़कर है मेरी बेटी।

- गरिमा कन्नौजिया, फाजलपुर

मेरी बेटी वन्या बेटे देवांश से बड़ी है, अहोई अष्टमी का व्रत मैंने पहली बार उसके लिए ही रखा था। एक मां के लिए बेटा और बेटी दोनों बराबर होते हैं, और वह उनके स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना करते हुए यह व्रत रखती है। अब यह सोच धीरे-धीरे बदल रही है कि बेटियां बेटों से कम हैं।

- श्वेता भारद्वाज, विजय नगर

बेटी दीक्षा के जन्म के नौ साल बाद बेटे भाविक का जन्म हुआ। बेटी ने पहले जन्म लेकर मुझे मातृत्व सुख दिया। मैंने अहोई अष्टमी का व्रत पहली बार बेटी के लिए ही रखा, और बेटे के जन्म के बाद दोनों बच्चों के लिए व्रत रखती हूं। मेरे लिए बेटा और बेटी दोनों में कोई फर्क नहीं है।

- अंशु बंसल, पल्लवपुरम

बेटियां मां के सबसे करीब होती हैं, जो बिना कुछ कहे मां का दुख दर्द समझती हैं। मेरी दो बेटियां हैं अनुष्का और अनन्या और मैं इन दोनों के लिए ही अहोई अष्टमी का व्रत करती हूं। शाम को व्रत खोलने के बाद दोनों की ओर से मुझे उपहार मिलता है, और हम बाहर डिनर करते हैं।

- डा. अनुजा गर्ग, सरस्वती लोक

मेरे लिए बेटियां बेटों से बढ़कर हैं, जो हर कदम पर मेरा साथ देती हैं। बेटे और बेटी में कोई अंतर नहीं है। उन्हें उचित शिक्षा दी जाए तो वह किसी भी मुकाम को हासिल कर सकती हैं। मेरी मां ने भी कभी बेटे और बेटी में अंतर नहीं किया। वही सोच मेरी भी है। यह व्रत संतान की सुख समृद्धि और खुशहाली के लिए है।

- डा. रेनू कांबोज, न्यू मोहनपुरी

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