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ब्रज के विरक्त संत पद्मश्री रमेश बाबा का निधन: पर्यावरण संरक्षण के लिए चलाए थे आंदोलन, गोशाला में 60 हजार गायें

Published: Tue, 06 Oct 2026 01:06 PM (GMT+05:30)Updated: Tue, 06 Oct 2026 01:21 PM (GMT+05:30)

पद्म श्री रमेश बाबा का बरसाना के मान मंदिर में निधन हो गया। उन्होंने ब्रज के पौराणिक स्वरूप और पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए।

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HighLights

  1. पद्म श्री रमेश बाबा का बरसाना में निधन हो गया।

  2. ब्रज के पौराणिक स्वरूप और पर्यावरण संरक्षण में योगदान।

  3. कृष्ण लीला से जुड़ी पहाड़ियों के लिए जन आंदोलन।

जागरण संवाददाता, मथुरा। ब्रज के विरक्त संत पद्मश्री रमेश बाबा का मंगलवार को निधन हो गया। वह 88 वर्ष के थे और काफी समय से बीमार थे। उन्होंने बरसाना के मान मंदिर में अंतिम सांस ली। रमेश बाबा ने अपना पूरा जीवन गो और पर्यावरण सेवा में लगाया। रमेश बाबा का जन्म 1938 में प्रयागराज में हुआ था। 1954 में वह 16 वर्ष की आयु में बरसाना आ गए। यहां वह राधारानी मंदिर में मृदंग बजाते थे। इस दौरान उन्होंने बरसाने में ही ब्रह्मांचल पर्वत पर मान मंदिर आश्रम बनाया और ठाकुर मान बिहारी की सेवा की।

रमेश बाबा ने पर्यावरण संरक्षण के लिए गहवरवन में काटे जा रहे पेड़ों के विरोध में अभियान चलाया। उन्होंने यहां बरसाना से लेकर राजस्थान के पहाड़ों पर हो रहे अवैध खनन के विरुद्ध आंदोलन किया। उनकी पहल ही थी कि वर्ष 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने ब्रज की पहाड़ियों पर खनन बंद करने का आदेश दिया।

उनकी बरसाना स्थित माताजी गोशाला में 60 हजार गाय रहती हैं

वर्ष 2007 में रमेश बाबा ने दो गोवंशी के साथ माताजी गोशाला का संचालन किया। आज माताजी गोशाला एशिया की सबसे बड़ी गोशाला बन गई और 65 हजार गायों का यहां संरक्षण हो रहा है। उनके गो सेवा और पर्यावरण संरक्षण के कार्यों को देख उन्हें 2019 में पद्मश्री सम्मान से विभूषित किया गया। वर्ष 1968 में रमेश बाबा ने ब्रजवासियों के साथ ब्रज चौरासी कोस की राधारानी ब्रजयात्रा निकाली। आज प्रतिवर्ष बीस हजार श्रद्धालु निश्शुल्क ब्रजयात्रा करते हैं। इनके रहने और खाने की व्यवस्था मान मंदिर आश्रम की ओर से की जाती है।

प्रयाग में हुआ था जन्म

तीर्थराज प्रयाग में बाबा का जन्म हुआ था। विख्यात ज्योतिषाचार्य बलदेव प्रसाद शुक्ल इनके पिता थे। इनकी माता का नाम हेमेश्वरी देवी थी। इस दंपती ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से रामेश्वरम में पुत्र कामेष्टि यज्ञ किया था। शिव कृपा से सन 1938 में पौष मास कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मध्याह्न 12 बजे बाबा का जन्म हुआ। इनके ज्योतिषाचार्य पिता ने इनका ललाट देखते ही घोषणा कर दी थी कि यह बालक गृहस्थ ग्रहण न कर ब्रह्मचारी ही रहेगा।

बाबा ने प्रयाग में ही विद्या ग्रहण की। उनके अंदर की आध्यात्मिक ज्योति उन्हें गृह त्याग कर ब्रज आने के लिए हमेशा प्रेरित करती रही। बाबा ने दो बार जन्मभूमि छोड़कर ब्रजभूमि आने की कोशिश की पर मां के स्नेह का बंधन उन्हें रोके रहा। तीसरी बार किसी तरह वे सब बंधनों को तोड़कर ब्रजभूमि आने में सफल हो ही गए।

इन धर्म स्थलों का कराया जीर्णोद्धार

रत्न कुंड ढभाला, विह्वल कुंड संकेत, कृष्ण कुंड नंदगांव, बिछुवा कुंड बिछोर, गया कुंड कामां, लाल कुंड दुदावली, गोपाल कुंड डीग, रुद्र कुंड जतीपुरा, गोमती गंगा कोसी कलां, ललिता कुंड कमई, नयन सरोवर सेऊ, बिछुआ कुंड जतीपुरा, मेंहदला कुंड हताना, धमारी कुंड और लोहरवारी कुंड आदि सरोवरों का जीर्णोद्धार बाबा के प्रयासों से हुआ है।

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