Mudiya Mela 2025: सनातन परंपरा का निर्वहन, महाप्रभु मंदिर में मुड़िया संतों ने कराया मुंडन
गोवर्धन में संत श्रीपाद सनातन गोस्वामी की स्मृति में मुड़िया महोत्सव मनाया जा रहा है। महाप्रभु मंदिर में मुड़िया संतों ने सिर मुंडवाकर सनातन परंपरा का पालन किया। चैतन्य महाप्रभु से प्रेरित यह परंपरा 469 वर्षों से चल रही है। गुरुवार को दो शोभायात्राएं निकाली जाएंगी। इस वर्ष 469वां मुड़िया महोत्सव भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है जिसमें संतों और श्रद्धालुओं का भारी जमावड़ा है।

संवाद सूत्र, जागरण, गोवर्धन। गिरिराज महाराज की परिक्रमा करने वाले महान संत श्रीपाद सनातन गोस्वामी की स्मृति में आयोजित मुड़िया महोत्सव की परंपरा एक बार फिर भक्ति के रंग में रंगी नजर आई। गोवर्धन स्थित महाप्रभु मंदिर में सोमवार को मुड़िया संतों ने सिर मुंडवाकर सनातन परंपरा का निर्वहन किया। चैतन्य महाप्रभु की प्रेरणा से जन्मी यह परंपरा 469 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है।
महंत गोपाल दास ने बताया कि वर्तमान में अधिवास महोत्सव चल रहा है, और परंपरा अनुसार शोभायात्रा से पूर्व मुंडन अनिवार्य होता है। इस बार सोमवार को शुभ दिन मानते हुए मुंडन संस्कार सम्पन्न कराया गया।
469वीं शोभायात्रा गुरुवार को दो स्थानों से होगी रवाना
- गुरुवार को दो पारंपरिक मुड़िया शोभायात्राएं निकाली जाएंगी।
- पहली यात्रा सुबह की बेला में राधा श्याम सुंदर मंदिर से महंत रामकृष्ण दास के नेतृत्व में निकलेगी।
- दूसरी और ऐतिहासिक यात्रा शाम को महाप्रभु मंदिर से रवाना होगी, जो सनातन परंपरा की जीवंत झलक पेश करेगी।
- इन शोभायात्राओं के माध्यम से श्रद्धालु न केवल संत सनातन की भक्ति को नमन करेंगे, बल्कि गोवर्धन की परिक्रमा करते हुए गौड़ीय वैष्णव परंपरा के महान अध्याय को पुनः स्मरण करेंगे।
मुंडन संस्कार में शामिल हुए अनेक संत
महाप्रभु मंदिर में हुए मुंडन संस्कार में प्रमुख संतों ने भाग लिया। इनमें गोपाल दास, विशंभर बाबा, निरोत्तम बाबा, पुजारी बाबा सुधा सिंधुदास, सच्चिदानंद दास, पुण्य कृष्ण दास, नित्य गौर दास, शिवानंद दास, वैष्णव चरण दास, कृष्ण चरण दास, विष्णु दास सहित अन्य संतों ने भी भक्ति समर्पण का यह प्रतीकात्मक संस्कार संपन्न कराया। राधा श्याम सुंदर मंदिर में बुधवार को मुंडन की परंपरा निभाई जाएगी।
चैतन्य महाप्रभु से प्रेरित संत सनातन की भक्ति कथा
गौरतलब है कि संत सनातन गोस्वामी, जो पहले बंगाल के राजा हुसैन शाह के मंत्री थे, चैतन्य महाप्रभु की भक्ति से प्रभावित होकर वृंदावन और गोवर्धन की शरण में आए। वे जीवनभर गिरिराज जी की सात कोसीय परिक्रमा करते रहे।
1556 में उनके गोलोक गमन के बाद गौड़ीय संतों ने सिर मुंडवाकर उनकी अंतिम यात्रा में परिक्रमा की थी, तभी से यह ‘मुड़िया परंपरा’ गुरु पूर्णिमा से जुड़कर ‘मुड़िया पूर्णिमा’ महोत्सव में परिवर्तित हो गई।
469वां महोत्सव: परंपरा और भक्ति का संगम
इस वर्ष 469वां मुड़िया महोत्सव धार्मिक उत्साह, भक्ति और शुद्ध सनातन परंपरा के साथ मनाया जा रहा है।गोवर्धन में उमड़े संतों और श्रद्धालुओं का जनसैलाब गिरिराज महाराज की भक्ति परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ब्रजभूमि को एक बार फिर दिव्य आभा से आलोकित कर रहा है।
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