बरसाना: यहां आज भी जीवित हैं राधा-कृष्ण का प्रेम, ब्रह्मांचल पर्वत पर अष्टसखियों संग विराजमान हैं श्रीराधा
बरसाना ब्रज की वह भूमि है जहां राधा-कृष्ण का प्रेम हर कण में बसा है। यहां राधारानी अपनी आठ सखियों के साथ विराजमान हैं। माना जाता है कि यहां उनकी दिव्य मिलन की अनुगूंज आज भी है। राधाष्टमी के दिन भक्तों की भीड़ उमड़ती है जो राधा-कृष्ण की भक्ति में डूब जाते हैं। लाडली महल यहाँ का प्रमुख मंदिर है और बरसाना की लीलाएं आस्था और परंपरा का संगम हैं।

किशन चौहान, जागरण, बरसाना। बरसाना… ब्रज की वह पावन भूमि जहां हर कण में राधा-कृष्ण का मधुर प्रेम गूंजता है। अरावली की पर्वतमालाओं में बसे ब्रह्मांचल पर्वत पर जब श्रद्धालु कदम रखते हैं, तो उन्हें यह आभास होता है मानो स्वयं राधारानी अपनी आठ सखियों के साथ अष्टदल कमल पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन दे रही हों।
यहां की श्याम और गौरवर्ण शिलाएं केवल पत्थर नहीं, बल्कि अमर प्रेम की गाथा हैं। भक्तों का विश्वास है कि इन्हीं में राधा-कृष्ण के दिव्य मिलन की अनुगूंज आज भी जीवित है। जहां सांसों में भी गूंजती है राधे-राधे।
बरसाना आकर भक्त केवल दर्शन नहीं करते, बल्कि प्रेम, करुणा और भक्ति की उस धारा में डूब जाते हैं, जिसका आरंभ राधा से होता है और अंत कृष्ण में। राधारानी और उनकी अष्टसखियों की यह अद्भुत गाथा हमें यह संदेश देती है कि प्रेम तभी पूर्ण होता है, जब उसमें समर्पण, सेवा और माधुर्य का संगम हो।
राधारानी का प्राकट्य और बरसाना की महिमा
भादों मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मूल नक्षत्र में बृषभानु और कीरत की दुलारी राधारानी का प्राकट्य हुआ। यह संयोग भी अद्भुत है कि राधा अष्टमी को अवतरित हुईं, उनकी सखियों की संख्या आठ है और कृष्ण का जन्म भी भादों की अष्टमी को हुआ। तभी से बरसाना राधाभक्ति का धाम बन गया। राधाष्टमी के अवसर पर बरसाना की गलियां भक्तों से इस कदर भर जाती हैं कि पैर रखने की भी जगह नहीं बचती। देश-विदेश से श्रद्धालु यहां पहुंचकर राधा-कृष्ण की भक्ति में डूब जाते हैं।
लाडली महल : राधा का दिव्य दरबार
बरसाना का हृदय है लाडली महल, जिसे राधा रानी का विशाल मंदिर कहा जाता है। 400 वर्ष पूर्व ओरछा नरेश द्वारा निर्मित इस मंदिर में पहुंचने के लिए 250 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। कहते हैं कि संवत् 1626 में ब्रजाचार्य नारायण भट्ट ने ब्रह्मेश्वर गिरि से राधारानी की प्रतिमा प्रकट की और तभी से यह धाम विश्वभर के श्रद्धालुओं का तीर्थस्थल बन गया। मंदिर की प्राचीरें, गलियां और सीढ़ियां भक्तों के जयघोष से गूंज उठती हैं। जब “राधे-राधे” की ध्वनि गूंजती है तो लगता है मानो स्वयं बरसाना प्रेम का साक्षात स्वरूप बन गया हो।
अष्टसखियां : राधा के बिना कृष्ण अधूरे, सखियों के बिना राधा अधूरी
राधारानी की आठ प्रधान सखियां केवल सहेलियां नहीं, बल्कि उनकी आत्मिक शक्ति हैं। ब्रज की लोकमान्यता है कि कृष्ण की लीलाएं तभी पूर्ण होती हैं, जब राधा और उनकी अष्टसखियां साथ हों।
ललिता सखी (ऊंचागांव)
प्रेम की रीति की ज्ञाता, मोरपंखी नीली साड़ी में सुसज्जित, सदैव राधा-कृष्ण की सेवा में तत्पर। पान खिलाना, कुंजों में खेल कराना और विहार की सेवा उनकी प्रमुख भूमिका है।
विशाखा सखी (कमई)
सुगंधित चंदन का लेप लगाती हैं और राधा को शृंगारित करती हैं। यह छाया की तरह हमेशा किशोरी जी के साथ रहती हैं।
चित्रा सखी (चिकसौली)
पीली साड़ी उनकी पहचान है। फल, शरबत और मेवा की सेवा करती हैं। प्रिया-प्रियतम के विश्राम के बाद जगाने का सौभाग्य इन्हें प्राप्त है।
इंदुलेखा (आजनौंख)
गजरा सजाने, प्रेमकथा सुनाने और नृत्य-गायन में पारंगत। इनकी सेवाएं किशोरी जी के दरबार की शोभा बढ़ाती हैं।
चंपकलता (करहला)
छप्पन भोग बनाने की कला इन्हीं के पास है। भोजन और चंवर सेवा का सौभाग्य चंपकलता के हिस्से में है।
रंगदेवी (रांकोली)
श्रृंगार और आभूषण सेवा में निपुण। राधा की वेणी गूंथती हैं और उनके नैनों में काजल लगाती हैं।
तुंगविद्या (डभाला)
नृत्य और संगीत की अपार प्रतिभा से युगल स्वरूप को रिझाती हैं। मधुर रागों से दरबार गुंजायमान कर देती हैं।
सुदेवी (सुनहरा, राजस्थान)
प्रिय-प्रियतम की नजर उतारती हैं और काजल लगाती हैं। रास और वन विहार के बाद उनकी सेवा में तत्पर रहती हैं। रंगदेवी की बहन होने के कारण दोनों की समानता लोगों को भ्रमित कर देती थी।
बरसाना की लीलाएं
- आस्था और परंपरा का संगम
- बरसाना केवल मंदिरों और पर्वतों तक सीमित नहीं, बल्कि यह लीलाओं की भूमि है।
- सांकरी खोर – दो पहाड़ियों के बीच का संकरा मार्ग, जहां कृष्ण गोपियों की मटकी फोड़कर माखन-दही लूटते थे।
- मोर कुटी, गहवरवन – राधा-कृष्ण के विहारस्थल, जहां आज भी भक्तों को दिव्य अनुभूति होती है।
- भानुगढ़, दानगढ़, मानगढ़ और विलासगढ़ – चार पर्वत, जिन्हें ब्रह्मा के चार मुख माना जाता है।
- बरसाना की हर गली, हर शिला, हर घाट राधा-कृष्ण की अनगिनत कथाओं का सजीव साक्षी है।
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