अद्भुत है शिवतांडव मंदिर, यहां है महाकाल की अष्टभुजी प्रतिमा
जागरण संवाददाता महोबा गोरखगिरि की पावन धरा में स्थापित होने के कारण शिवतांडव मंदिर

जागरण संवाददाता, महोबा : गोरखगिरि की पावन धरा में स्थापित होने के कारण शिवतांडव मंदिर का विशेष महत्व है। चंदेल शासक नान्नुक ने 11वीं सदी में ऐतिहासिक मदन सागर सरोवर के पश्चिम में गोरखगिरि की उत्तर तरफ शिला पर भगवान भोलेनाथ की महाकाल की मुद्रा में तांडव नृत्य करती दस भुजी गजानन प्रतिमा का निर्माण कराया था। जो शिव तांडव के नाम से देश विदेश में प्रसिद्ध है।
महोबा में शिवतांडव की यह मूर्ति उत्तर भारत में अपने किस्म की अनोखी प्रतिमा है। गजासुर के वध के उपरांत शिव जी ने जो नृत्य किया था, बाद में वही शिवतांडव के नाम से प्रसिद्ध हुआ था। इतिहासकार संतोष पटैरिया कहते हैं कि यह भव्य प्रतिमा एक चट्टान पर उत्कीर्ण की गई है। इसका वर्णन कर्मपुराण में भी मिलता है। इस प्रकार की गजासुर प्रतिमा दक्षिण में ऐलोरा, हेलविका तथा दारापुरम में भी है। श्रद्धालुओं का लगता जमघट
शिवतांडव में महा शिवरात्रि, मकर संक्रांति और सावन मास के सभी सोमवार को भक्तों का भारी सैलाब उमड़ता है। ऐसी मान्यता है महाकाल की तांडव प्रतिमा में मत्था टेकने से जो मांगों वह मिल जाता है। गोरखगिरि के पहरेदार
गोरखगिरि का शिवतांडव को मुख्य द्धार भी कहा जाता है। वह यहां एक पहरेदार की मुद्रा में नजर आते हैं। गोरखगिरि में सिद्ध बाबा सहित अन्य मंदिरों में दर्शन को जाने वाले श्रद्धालु सबसे पहले यहां माथा टेकते हैं, फिर आगे बढ़ते हैं। जल्द होगा कायाकल्प
गोरखगिरि के साथ शिवतांडव मंदिर का भी कायाकल्प होना है। डीएम सत्येंद्र कुमार ने इसके लिए शासन को प्रस्ताव भी भेज दिया है। मंदिर को भव्य पंडाल के आकार का तैयार किया जाएगा। आगे वाहनों के लिए पार्किंग, सुंदर पार्क आदि तैयार होगा।
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