लखनऊ, [जितेंद्र उपाध्याय]। भगवान शिव-मां पार्वती की कृपा पाने की काल भैरव अष्टमी 27 नवंबर को है।

मार्गशीर्ष महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन ही काल श्री भैरव जयंती मनाई जाती है। भगवान शिव के रौद्र रूप के प्रतीक श्री कालभैरव की कृपा भोलेनाथ व मां पार्वती की पूजा करने से मिल जाती है। आचार्य एसएस नागपाल ने बताया कि इस दिन शिव के पांचवें रुद्र अवतार माने जाने वाले कालभैरव की पूजा-अर्चना साधक विधि-विधान से की जाती है। अष्टमी तिथि 27 नवंबर को सुबह 5:43 बजे से शुरू होकर 28 नवंबर को सुबह छह बजे तक रहेगी ।

काल भैरव भगवान शिव का रौद्र, विकराल एवं प्रचंड स्वरूप है। तंत्र साधना के देवता काल भैरव की पूजा रात में की जाती है इसलिए अष्टमी में प्रदोष व्यापनी तिथि का विशेष महत्व होता है। यह दिन तंत्र साधना के लिए उपयुक्त माना गया है। काल भैरव को दंड देने वाला देवता भी कहा जाता है इसलिए इनका शस्त्र दंड है। उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति चौकी पर गंगाजल छिड़ककर स्थापित करें। इसके बाद काल भैरव को काले, तिल, उड़द और सरसो का तेल अर्पित करे।

भैरव जी का वाहन श्वान (कुत्ता ) है। भैरव के वाहन कुत्ते को पुआ खिलाना चाहिए। भैरव जी को काशी का कोतवाल माना जाता है। भैरव के पूजा से शनि राहु केतु ग्रह भी शांत हो जाते हैं। बुरे प्रभाव और शत्रु भय का नाश होता है। राजेंद्र नगर के महाकाल मंदिर के व्यवस्थापक अतुल मिश्रा ने बताया कि इस दिन बाबा का श्री काल भैरव स्वरूप में श्रृंगार होगा और देर रात आरती होगी। मनकामेश्वर मंदिर की महंत देव्या गिरि ने बताया कि इस दिन बाबा की विशेष आराधना के साथ ही काल भैरव से कोरोना का नाश करने की कामना की जाएगी।

Edited By: Vikas Mishra