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    उत्तर प्रदेश BJP अध्यक्ष के चयन की उलटी गिनती शुरू, सात दिन में मिल सकता है नया मुखिया; इन नामों की चर्चा तेज

    By Dharmendra PandeyEdited By: Dharmendra Pandey
    Updated: Wed, 03 Dec 2025 05:58 PM (IST)

    UP BJP President: उत्तर प्रदेश में अध्यक्ष पद के लिए अप्रत्याशित निर्णय ले सकती है। पार्टी दलित-पिछड़ों की राजनीति के बीच, ब्राह्मणों को साधने या किसी ...और पढ़ें

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    लखनऊ में भाजपा का उत्तर प्रदेश मुख्यालय

    राज्य ब्यूरो, जागरण, लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव में भी जीत की योजना बना रही भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश के लिए अध्यक्ष के चयन का खाका तैयार कर चुकी है। पार्टी का शीर्ष और प्रदेश नेतृत्व तमाम कयास पलटा सकता है। माना जा रहा है कि सात दिन में उत्तर प्रदेश भाजपा का नाम तय हो जाएगा।

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    भाजपा उत्तर प्रदेश में अध्यक्ष पद के लिए अप्रत्याशित निर्णय ले सकती है। पार्टी दलित-पिछड़ों की राजनीति के बीच, ब्राह्मणों को साधने या किसी महिला नेता को आगे लाने पर विचार कर रही है। 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा की चुनौती को देखते हुए, भाजपा जातीय समीकरणों को साधने का प्रयास कर रही है। पार्टी जल्द ही प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा कर सकती है, जिसमें कई नाम चर्चा में हैं।

    किसी ब्राह्मण को भी संगठन की कमान सौंपने का दांव 

    चर्चा है कि गठबंधन सहयोगियों और जिला अध्यक्षों के सहारे जमीन पर सभी जातीय समीकरण साध चुकी भाजपा सूबे के 20 प्रतिशत सवर्णों में सबसे अधिक भागीदारी वाले ब्राह्मणों को साधने के लिए 2018 की तरह किसी ब्राह्मण को भी संगठन की कमान सौंपने का दांव चल सकती है। इसके साथ ही ऐसी महिला नेता को आगे लाया जा सकता है जो कई समीकरणों को एक ही साथ साध सकती हैं।

    सामने समाजवादी पार्टी की चुनौती 

    उत्तर प्रदेश में 2027 के प्रारंभ में विधानसभा चुनाव होने हैं। उसके सामने समाजवादी पार्टी की चुनौती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक यानी पीडीए फार्मूले से समाजवादी पार्टी ने भाजपा को जोरदार झटका दिया है। इसे देखते हुए ही भाजपा ने गहन विचार मंथन के बाद संगठन सृजन किया है। भाजपा ने 98 संगठनात्मक जिलों में 84 के जिलाध्यक्ष घोषित कर दिए हैं। इनमें 45 सवर्ण, 32 अन्य पिछड़ा वर्ग और सात अनुसूचित जाति से अध्यक्ष बनाकर जातीय समीकरण को साधने का प्रयास किया है।

    दावेदारी की अटकलों ने फिर जोर पकड़ा 

    अब प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा के बीच में दावेदारी की अटकलों ने फिर जोर पकड़ा है। पिछड़ा वर्ग से प्रदेश सरकार में मंत्री धर्मपाल सिंह, केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा, सांसद बाबूराम निषाद सहित कई नाम चर्चा में चल रहे हैं तो दलितों में पूर्व केंद्रीय मंत्री रामशंकर कठेरिया और एमएलसी विद्या सागर सोनकर के नाम प्रमुखता से लिए जा रहे हैं।

    भाजपा और पीडीए 

    पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी ने संभावना जताई कि आवश्यक नहीं कि भाजपा पीडीए की उस पिच पर खेले जो सपा मुखिया अखिलेश यादव ने बनाई है। भाजपा ने विपक्ष के जातीय दांव को बिहार में निष्फल कर दिया है, इसलिए पार्टी को सबसे अधिक विश्वास मोदी मैजिक और पीडीए वर्ग से ही आने वाले बड़े लाभार्थी वोट बैंक पर है।

    ब्राह्मणों की भाजपा से नाराजगी के मुद्दे की भी हवा

    दलित-पिछड़ों की उफान लेती राजनीति में विपक्ष ने ब्राह्मणों की भाजपा से नाराजगी के मुद्दे को भी हवा दी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यूं तो संत होने के नाते जाति के दायरे में नहीं आते, लेकिन विपक्ष ही उन्हें ठाकुर बताता है तो इस वर्ग का प्रतिनिधित्व हो जाता है। करीब 12 प्रतिशत ब्राह्मण आबादी को साधने के लिए जैसे 2018 में महेंद्र नाथ पांडेय को अध्यक्ष बनाया गया था, वैसे ही इस वर्ग से कोई चेहरा आ सकता है।

    पहली बार किसी महिला को भी अध्यक्ष 

    इसके अलावा पार्टी में एक सुगबुगाहट तेजी से बढ़ी है कि बिहार की सफलता में महिला मतदाताओं की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए भाजपा उत्तर प्रदेश में पहली बार किसी महिला को भी अध्यक्ष बनाने पर विचार कर सकती है। इनमें साध्वी निरंजन ज्योति भी एक दावेदार मानी जा रही हैं जो आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने के साथ हिंदुत्व और पिछड़े वर्ग की चेहरा हैं।

    लखनऊ में शीर्ष नेताओं और संघ की बैठक

    उत्तर प्रदेश भाजपा से जुड़े तमाम मुद्दों पर विचार विमर्श के लिए लखनऊ में शीर्ष नेताओं और संघ की बैठक भी हुई। सोमवार शाम को संघ के सह सरकार्यवाह अरुण कुमार व भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष के साथ सीएम योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री भी बैठक में शामिल थे। इसमें 2027 के विधानसभा चुनाव, पंचायत चुनाव और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष को लेकर चर्चा हुई। प्रदेश अध्यक्ष किस जाति से होगा, ये सबसे अहम है। यूपी की राजनीति जातियों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। एक समय तक यहां जातियों को साध कर ही सरकार बनाने का काम किया गया है, लेकिन 2017 के बाद से यूपी में चुनाव का पैटर्न बदल गया है।

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