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    संगीत का ऐसा जुनून जॉब छोड़ किया म्यूजिक थेरेपिस्ट का काम, अब विदेश तक फैली सुरों की 'आभा'

    By JagranEdited By:
    Updated: Mon, 09 Jul 2018 12:37 PM (IST)

    35 वर्षो से अधिक शास्त्रीय गायन में अध्यापनरत। ¨हदी में आ चुकी हैं दो किताबें, अंग्रेजी में किताब का विमोचन जल्द।

    संगीत का ऐसा जुनून जॉब छोड़ किया म्यूजिक थेरेपिस्ट का काम, अब विदेश तक फैली सुरों की 'आभा'

    लखनऊ[दुर्गा शर्मा]। पिता का रेडियो का व्यापार था। मा ने विशारद (सितार) किया था। बेटी का संगीत से जुड़ाव लाजिमी था। 35 वर्षो से अधिक शास्त्रीय गायन में अध्यापनरत विकास नगर निवासी आभा सक्सेना का जीवन कला साधना का पर्याय सा है। नौकरी छोड़ म्यूजिक थेरेपी के रूप में चेतना स्कूल के 'खास बच्चों' को संगीत की दुनिया से जोड़ा। विभिन्न रागों को समाहित करते हुए अब तक दो किताबें आ चुकी हैं। उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत को लेकर अंग्रेजी में लिखी तीसरी किताब का जल्द विमोचन होगा। ताकि विदेश तक शास्त्रीय गायन के सुरों की 'आभा' फैल सके।

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    आभा बताती हैं, आगरा में जन्म हुआ। फिर परिवार कानपुर आकर बस गया। शिक्षा-दीक्षा कानपुर में ही हुई। पं. सिद्धनाथ मिश्र जी से कथक की शिक्षा ली। पं. शिव नंदन राव त्रिपाठी जी से सितार सीखा। गायन की शिक्षा पं. राम सेवक तिवारी जी से ली। आठ साल घर पर ही प्रशिक्षण के बाद कॉलेज में पाच वर्षो तक एसएस बोडस जी से शिक्षा प्राप्त की। कानपुर विवि से एमए मनोविज्ञान और एमए गायन किया। साथ ही प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद से भी गायन एवं सितार में संगीत प्रवीण किया। भातखंडे संगीत संस्थान सम विश्वविद्यालय, लखनऊ व गाधर्व महामंडल, मुंबई से भी संगीत विशारद किया।

    नौकरी छोड़ 'खास बच्चों' के लिए काम:

    विवाह के बाद लखनऊ आना हुआ। संगीत शिक्षिका के रूप में उप्र उच्च शिक्षा आयोग द्वारा कानपुर में आचार्य नरेंद्र देव डिग्री कॉलेज में संगीत प्रवक्ता के पद पर नियुक्ति हुईं। आभा बताती हैं, इसी दौरान चेतना संस्थान के 'स्पेशल चाइल्ड' से मुलाकात हुई। लगा कि संगीत इन्हें ठीक कर सकता है। नौकरी छोड़कर पाच साल तक चेतना संस्थान में म्यूजिक थेरेपिस्ट के रूप में काम किया। सकारात्मक परिणाम मिले। महिला डिग्री कॉलेज, लखनऊ में भी पाच वर्ष तक शिक्षण कार्य किया। 26 वर्ष दयानंद कॉलेज, महानगर में शिक्षण कार्य किया। इस दौरान संगीत की तीनों विधाओं-गायन, वादन और नृत्य की शिक्षा प्रदान की।

    तैयार कर रहीं भावी पीढ़ी:

    आभा घर पर ही 'संगीत साधना केंद्र' में शास्त्रीय संगीत की शिक्षा देती हैं। खासकर बच्चों को गायन और वादन की बारीकिया सिखाती हैं। इनके तैयार बच्चे कई मंचों पर अपने हुनर का प्रदर्शन कर चुके हैं।1देश-विदेश में परीक्षक भी 1आभा कई संस्थानों से संगीत परीक्षक के रूप में भी जुड़ी हैं। इसमें देश के साथ लंदन की राम सहाय मेमोरियल संगीत महाविद्यालय संगीत संस्थान भी शामिल है।

    दो किताबें, 64 राग:

    2017 में 'नव्य संगीत प्रवीण भाग-एक' और 'नव्य संगीत प्रवीण भाग-दो' पुस्तकें आ चुकी हैं। इनमें 64 रागों को स्वयं द्वारा शब्द, स्वर रचित बड़े ख्याल, छोटे ख्याल, तराना, चतुरंग, तिरवट, ध्रुपद, धमार, ठुमरी आदि स्वरलिपि सहित दिया है।

    नाती-नातिन जानें नानी का संगीत प्रेम:

    आभा की दोनों बेटिया विदेश में रहती हैं। तीन नातिन और एक नाती है। बड़ी नातिन अमेरिका में ही वोकल सीख रही है। छोटी नातिन लंदन में शास्त्रीय गायन और कथक सीख रही है। आभा कहती हैं, किताबें अपने काम को औरों तक पहुंचाने का बेहतर माध्यम होती हैं। इच्छा यही है कि विदेश में रह रहे नाती और नातिन नानी के संगीत प्रेम को किताबों के जरिए समझे। मैंने यह किताब इन्हीं को समर्पित की है।

    अब अंग्रेजी में किताब:

    'फंडामेंटल्स ऑफ नॉर्थ इंडियन क्लासिकल म्यूजिक' शीर्षक से किताब लिखी है। इसमें नए रागों को स्वरलिपि करने के साथ ही शास्त्रीय गायिकी की आधारभूत बातों को बताया गया है। यह किताब विदेश में संगीत संस्थानों में उपलब्ध कराई जाएगी। गायन प्रशिक्षु को सिखाए जाने वाले शुरुआती 14 राग समेत साधारण भाषा में शास्त्रीय गायन से परिचय कराया गया है।