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    आपराधिक आरोप वाले लोगों के जीवन के अधिकार की अनदेखी नहीं की जा सकती, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

    Updated: Thu, 13 Feb 2025 02:55 AM (IST)

    सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि अगर किसी व्यक्ति पर आपराधिक आरोप हैं तो संविधान के तहत उसके जीवन एवं स्वतंत्रता के अधिकार की अनदेखी नहीं की जा सकती। यह फैसला यूपी गैंग्सटर्स एक्ट के तहत तीन लोगों के खिलाफ दर्ज मामले को खारिज करते हुए आया है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में आवश्यक गंभीरता को न्यायिक रूप से सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

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    कोर्ट ने यूपी गैंग्सटर्स एक्ट के तहत तीन लोगों के खिलाफ दर्ज मामले को खारिज कर दिया।

    पीटीआई, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि अगर किसी व्यक्ति पर आपराधिक आरोप हैं तो संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत उसके जीवन एवं स्वतंत्रता के अधिकार की अनदेखी नहीं की जा सकती। कोर्ट ने यूपी गैंग्सटर्स एक्ट के तहत तीन लोगों के खिलाफ दर्ज मामले को खारिज कर दिया।

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    जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने कहा कि जिन लोगों के खिलाफ उत्तर प्रदेश गैंग्सटर्स और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत मामला दर्ज किया गया है, वे सामान्य नहीं बल्कि गंभीर मामले हैं।

    कोर्ट ने कहा कि हमारा मानना है कि ऐसे मामलों के लिए आवश्यक गंभीरता को न्यायिक रूप से सीमित नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इससे प्रत्येक मामले की विशिष्टओं पर बहुत असर पड़ेगा। 

    भारत के संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्रदत्त जीवन एवं स्वतंत्रता के अधिकार को केवल इस कारण से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं। 

    कोर्ट ने कहा, ''जब इस बाबत अधिनियम को लागू करने की बात आती है तो संबंधित अधिकारियों को अनियंत्रित विवेकाधिकार देना नासमझी होगी।'

    'कोर्ट ने कहा कि कोई भी प्रविधान जितना कठोर या दंडात्मक होगा, उसे सख्ती से लागू करने पर उतना ही अधिक जोर लगाने की आवश्यकता होगी। इसलिए पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के 17 जनवरी, 2024 के उस आदेश को रद कर दिया, जिसमें तीन व्यक्तियों- जय किशन, कुलदीप कटारा और कृष्ण कटारा के खिलाफ प्राथमिकी को रद करने से इनकार कर दिया गया था। 

    इन लोगों ने इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था कि उनके खिलाफ तीन प्राथमिकी दो परिवारों के बीच संपत्ति विवाद से संबंधित थीं। आरोप दीवानी प्रकृति के थे और अधिनियम के तहत कार्यवाही रद करने योग्य थी।