तू ही दुर्गा तू ही देश, भारत राष्ट्र को भारत माता का यह दुर्गा स्वरूप कब और कैसे मिला- मालिनी अवस्थी
Navratri 2021 अवनींद्रनाथ टैगोर ने 1905 में भारत माता को चारभुजाधारी देवी के रूप में चित्रित किया जो केसरिया वस्त्र धारण किए हुए है। भारत माता का यह दिव्य स्वरूप हाथ में पुस्तक माला तथा धान की बाली लिए है।

मालिनी अवस्थी। शारदीय नवरात्र पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जा रही है। घर-घर में दुर्गा मां की स्थापना हुई है, मां के नौ रूपों की पूजा-अर्चना चल रही है और इसी समय स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। मालिनी अवस्थी मानती हैं कि ऐसे में दृष्टि डालना सामयिक होगा कि भारत राष्ट्र को भारत माता का यह दुर्गा स्वरूप कब और कैसे मिला....
त्वं ही दुर्गा दशप्रहरण-धारिणी,
कमला कमलदल विहारिणी,
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वां।
नमामि कमला अमला अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम्।
वंदे मातरम्।।
बंकिमचंद्र की ये कालजयी अमर पंक्तियां जब-जब सुनती हूं, मन विह्वल व रोमांचित हो उठता है। अपनी भारत मां को दुर्गा कहकर पुकारते बंकिमचंद्र ने वंदे मातरम् कहकर राष्ट्र को देखने की दृष्टि ही बदल डाली। अपनी जन्मभूमि को दैवीय मानकर उसमें देवी की छवि देखना-यह हमारी भारतीय संस्कृति का अपना आलोक है। जो संस्कृति ईश्वर को भी मानव बना सकने का साहस और सद्भाव रखे, वह देश को देवी रूप में पूजित करे तो आश्चर्य कैसा!
यह मानचित्र भारत माता
1905 की बात है। प्रसिद्ध लेखक श्री के. एम. मुंशी ने अरबिंदो घोष से प्रश्न किया जो आज एक शताब्दी बाद भी उतना ही प्रासंगिक है। प्रश्न था-‘देशभक्त कैसे बना जा सकता है?’ हिंदू राष्ट्रवाद के जनक अरबिंदो घोष ने दीवार पर लगे ब्रिटिश साम्राज्य अधिकृत भारत के मानचित्र को दिखाते हुए कहा-‘तुम यह चित्र देखते हो, यह मानचित्र नहीं है, यह भारत माता का चित्र है। इसके नगर, पर्वत, नदियां, वन आदि इसके शरीर का निर्माण करते हैं। तुम ध्यान से इस मानचित्र को देखो तो पाओगे कि भारत एक भूखंड का टुकड़ा नहीं, एक ममतामयी मां है और मां की आराधना नवधा भक्ति के साथ की जानी चाहिए।’ स्वामी अरबिंदो ने भारत माता की आराधना, उपासना में नवधा भक्ति का जो भाव इंगित किया, उससे स्पष्ट होता है कि किस प्रकार भारत की संस्कृति में व्याप्त देवीशक्ति में विश्वास, देवी के नौ रूपों की पूजा-अर्चना भारत माता की आराधना का रूप ले चुकी थी।
मान्यताओं में मां है धरती
बहुत दिन नहीं बीते जब इस बात पर राष्ट्रीय बहस छिड़ी थी कि वंदे मातरम् का नारा क्या सांप्रदायिक है? आप सभी को याद होगा किस प्रकार अनेक लोगों ने भारत माता की जयकार करने से न सिर्फ इन्कार किया अपितु इस पर आपत्ति भी जताई थी और इन नारों को सांप्रदायिक तक करार दिया था। भारत माता की जय और वंदे मातरम् दोनों का अभिप्राय एक ही है। वंदे मातरम् का अर्थ है- ‘मैं अपनी मां का वंदन करता हूं।’ हिंदू जीवन दर्शन के सभी पंथ, मतावलंबी, विश्वासों में धरती को मां माना गया है। सबसे पुरानी परंपरा जो जनजातीय लोक विश्वासों में मिलती है, वहां धरती को मां कहकर पुकारा गया है क्योंकि धरती उदारता से सब कुछ देती है। ऐसी संस्कृति जो भूखंड को मां से गुरुतर मानती हो, वहां मातृभूमि को माता मानना चकित नहीं करता। यहां ऐतिहासिक पौराणिक संदर्भों पर दृष्टि डालते हैं- आदिकाल से ही पृथ्वी को मातृभूमि की संज्ञा दी गई है। भारतीय अनुभूति में पृथ्वी आदरणीय बताई गई है, इसीलिए पृथ्वी को माता कहा गया। महाभारत के यक्ष प्रश्नों में यह अनुभूति होती है। यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा था कि आकाश से भी ऊंचा क्या है और पृथ्वी से भी भारी क्या है? युधिष्ठिर ने बताया कि पिता आकाश से ऊंचा है और माता पृथ्वी से भी भारी है। हम उनके अंश हैं। अथर्ववेद में कहा गया है कि ‘माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या:’ अर्थात- भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं। यजुर्वेद में भी कहा गया है- ‘नमो मात्रे पृथिव्ये, नमो मात्रे पृथिव्या:’ अर्थात-माता पृथ्वी (मातृभूमि) को नमस्कार है, मातृभूमि को नमस्कार है। वाल्मीकि रामायण में भगवान राम कहते हैं, ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ अर्थात- जननी और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर है।
बंगाल से बजा बिगळ्ल
आज के संदर्भ में देखें तो भारत को मां कहकर संबोधित करना बंगाल से प्रारंभ हुआ। बंगाल में शक्ति उपासना संस्कृति का मुख्य बिंदु रहा है। काली, दुर्गा, मनसा, चंडी आदि रूपों के उपासक बंगाल की आत्मा में देवी का वास है। यह आश्चर्य नहीं कि सर्वप्रथम बंगाल से ही भारत माता के स्वरूप एवं वंदे मातरम् उद्घोष का प्राकट्य हुआ। भारत माता के प्रयोग का प्रामाणिक संदर्भ किरण चंद्र बंधोपाध्याय के नाटक ‘भारत माता’ में मिलता है। इसका मंचन सबसे पहले 1873 में किया गया। 1770 में बंगाल में आए भयंकर अकाल पर आधारित इस नाटक की नायिका एक ऐसी गृहणी है जिसका पति भागकर वन में शरण लेता है जहां उसकी भेंट क्रांतिकारियों के दल से होती है। वन में ही एक पुजारी उसे मंदिर ले जाता है जहां भारत माता की मूर्ति शोभायमान है। उस मंदिर से प्रेरणा लेकर वे साथ होकर क्रांति का बिगुल बजाते हैं और अंग्रेजों को पराजित करने के लक्ष्य में जुट जाते हैं। क्रांतिकारियों, राष्ट्रभक्तों के मानस में यहीं से भारत माता की अवधारणा स्थापित हुई होगी।
संजीवनी साबित हुआ उद्घोष
भला कौन भूल सकता है बंकिमचंद्र द्वारा रचित ‘आनंद मठ’ और ‘वंदे मातरम्’ को। इस गीत ने भारत में क्रांति और नवजागरण की कैसी अलख जगाई! सामाजिक वैज्ञानिक काल ओल्सन ने लिखा है कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ‘आनंद मठ’ में भारत माता को एक भारतीय हिंदू देवी के रूप में प्रदर्शित करते हैं। यह देवी अत्याचार पराधीनता और अपमान के बोझ से दमित भारत की एक ऐसी प्रतीक देवी के रूप में उभरती है जिसकी संतानों (पराधीन भारत की प्रजा) को अपनी मां की चिंता नही है। ये संतानें मां के मान -सम्मान के प्रति उदासीन है। उन्हें जागना होगा। वह जागें ताकि अपनी भारत माता को परतंत्रता के दुख से मुक्त करा सकें। 1875 में बंकिमचंद्र ने ‘वंदे मातरम्’ लिखा, यह गीत और विशेष रूप से वंदे मातरम् का उद्घोष सभी देशभक्तों और क्रांतिकारियों के लिए जयघोष, वेद वाक्य बन गया। स्वतंत्रता की लड़ाई में इस उद्घोष ने संजीवनी का कार्य किया। बंगाल और संपूर्ण भारत में देश को एक मां, एक देवी के रूप में देखने का विचार अत्यंत लोकप्रिय हुआ।
रामतीर्थ की मातृ वंदना
यहां पर स्वामी रामतीर्थ का स्मरण आता है। 1873 में जन्मे महान वेदांती स्वामी रामतीर्थ ने कहा था, ‘भारत भूमि मेरा शरीर है, कन्याकुमारी मेरे चरण हैं। हिमालय मेरा सिर है। मेरे केशों से गंगा बहती है, मेरे बालों से ब्रह्मपुत्र और सिंधु निकलती हैं। विंध्याचल मेरे कमर की करधनी, कोरोमंडल मेरा दायां पांव है और मालाबार मेरा बायां पांव। मैं संपूर्ण भारत हूं और पूरब और पश्चिम मेरी भुजाएं हैं, मैं उन्हें सीधी रेखा में आलिंगन करने के लिए भुजाएं फैलाए हुए हूं, मैं अपने प्रेम में शाश्वत हूं।’ 32 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हुए स्वामी रामतीर्थ के व्याख्यानों का संकलन 1940 में ‘भारत माता’ नाम से लखनऊ में प्रकाशित हुआ।
चार भुजाओं में चित्रित देवी
इस मां की छवि कैसी होगी, इसे साकार किया गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर के भतीजे और भारत में आधुनिक चित्रकला के जनक अवनींद्रनाथ टैगोर ने। उन्होंने 1905 में भारत माता को चारभुजाधारी देवी के रूप में चित्रित किया जो केसरिया वस्त्र धारण किए हुए है। हाथ में पुस्तक, माला तथा धान की बाली लिए हैं। यह चित्र इतना प्रसिद्ध हुआ कि स्वदेशी आंदोलन में इसका वृहद प्रयोग किया गया। भारत माता के चित्र और वंदे मातरम् का यह संयुक्त प्रभाव क्रांतिकारियों का संबल बन गया। 1907 आते-आते भयभीत अंग्रेजी सरकार ने अपने गुप्तचरों से अध्ययन कराया कि वंदे मातरम् एवं भारत माता की जय नारे का भारतीयों के ऊपर क्या प्रभाव हुआ है। इंकलाब जिंदाबाद व जय हिंद भी देश के नारे थे किंतु वंदे मातरम् और भारत माता की जय एक दर्शन, एक विचार बन गया। इसी समय अनुशीलन समिति का गठन हुआ जो अंग्रेज-विरोधी, गुप्त, क्रांतिकारी सशस्त्र संस्था थी। इसका उद्देश्य बंकिमचंद्र के बताए गए मार्ग का अनुशीलन करना था। स्वामी अरविंदो इसके संस्थापकों में से थे। अनुशीलन समिति एक ऐसा समूह था, जिसने ‘आनंद मठ’ से प्रेरणा लेकर शस्त्र पूजा, शस्त्र आराधना करते हुए महिषासुर मर्दिनी देवी दुर्गा की शारदीय नवरात्र में आराधना और दशहरे के दिन शस्त्र पूजा प्रारंभ कर दी जो धीरे-धीरे लोकप्रिय होती चली गई। भगत सिंह ने अदालत में भारत मां की जय कहकर अंग्रेजों की नींद उड़ा दी थी और वंदे मातरम कहते हुए सुखदेव, राजगुरु के साथ फांसी के फंदे पर झूल गए थे। यह उद्घोष राजनीतिक नहीं, हमारी सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना का उत्स है।
राष्ट्रवाद और देवत्व का समागम
देश में देवत्व देखने का विचार समय के साथ लोकप्रिय होता गया। इस विचार के अप्रतिम नायक थे सावरकर, जो दासता की बेड़ियों मे बंधी भारत माता को जय दिलाने के संघर्ष के मुख्य पुरोधा थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसी विचार का प्रवर्तक है और संघ के सभी कार्यक्रम आयोजनों में भारत माता का चित्र अनिवार्यत: रहता है। राष्ट्र को मां मानकर उसकी आराधना करने के दर्शन ने कालांतर में मूर्त आकार पाया। वाराणसी में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के प्रांगण में भारत माता का मंदिर बना। इसका उद्घाटन 1936 में महात्मा गांधी ने किया। इस मंदिर में संगमरमर पर उकेरा गया अविभाजित भारत का त्रिआयामी भौगोलिक मानचित्र है। बनारस के अलावा हरिद्वार में भारत माता का मंदिर है जिसका उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1983 में किया था। दौलताबाद किला, महाराष्ट्र में भारत माता का मंदिर है। उज्जैन, चित्रकूट में भारत माता का अत्यंत सुंदर मंदिर है। भारत की आजादी की लड़ाई में राष्ट्रवाद और देवत्व कहीं न कहीं एक-दूसरे में विलीन होते दिखते हैं। आइए, इस नवरात्रि हम दुर्गा माता के ध्यान-अर्चन के साथ भारत माता का कृतज्ञ अर्चन भी करें। वंदे मातरम!
(लेखिका प्रख्यात लोकगायिका हैं)
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