लखनऊ, जागरण संवाददाता। मोबाइल और इंटरनेट आज विद्यार्थियों के लिए भी लाइफलाइन की तरह काम करने लगा है। अब इसके मोहपाश से छूट पाना असंभव माना जाने लगा है। मोबाइल और इंटरनेट भी तकनीक के शक्तिशाली हथियार हैं। बशर्ते हम यह समझने में भ्रमित हो जाते हैं कि हमारे बच्चे इनका स्वतंत्र प्रयोग करने की कितनी योग्यता रखते हैं? हम प्रायः अपनी व्यस्तता या किसी और कारण का बहाना लेकर अपने उत्तरदायित्वों का पूरा निर्वहन नहीं करते और बच्चों को कड़ी निगरानी में, निश्चित समय के लिए मोबाइल उपलब्ध कराने के बजाय उन्हें केवल समझाकर मोबाइल थमा देते हैं।

यहीं से शुरू होता है मोबाइल के मोहपाश का खतरनाक खेल। माता-पिता की ओर से छूट पाकर धीरे-धीरे वह इसका इतना आदी हो जाता है कि बाद में रोक लगाए जाने पर वह स्वयं को हानि पहुंचाने से लेकर अवसाद आदि न जाने किन-किन बुरे दौर से गुजरने को विवश होता है। पढ़ाई से तो वह दूर जाता ही है, जीवन का संकट भी उस पर चारों ओर से मंडराने लगता है। यह जितनी विकट समस्या है, इसका समाधान उतना ही सहज है। इसलिए उन्हें अपनी निगरानी में ही उसके प्रयोग की अनुमति दें। जिन एप्लीकेशन्स की उनके लिए उपयोगिता न हो उन्हें मोबाइल में न रहने दें।

बच्चे जिद करें, तो उन्हें प्यार से समझाकर अपने व्यक्तिगत फोन पर थोड़े समय के लिए उन्हें सोशल साइट्स से जुड़ने या देखने की अनुमति अवश्य दें। स्वयं भी अनावश्यक रूप से फोन पर न लगे रहें। बच्चों को परिवार के साथ घुलने-मिलने के ऐसे अवसर दें कि मोबाइल की कमी उन्हें न महसूस हो। मेरा यही निवेदन है कि मोबाइल आज समय की मांग बन चुका है, यह स्मरण रखते हुए हर समय बच्चों को टोकते-डाटते न रहें बल्कि उन्हें भरोसे में लेकर ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास करें कि वे स्वयं मोबाइल से हटकर आपकी ओर, उस गतिविधि की ओर आकर्षित हों। डा. अमित अवस्थी, लामार्टीनियर कालेज, लखनऊ

Edited By: Vrinda Srivastava

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