लखनऊ [अम्बिका वाजपेयी/पुलक त्रिपाठी]। क्या आपको पता है कि आपका फोन लॉक सिर्फ अपनों के लिए है। दरअसल, फोन पर लॉक कुछ भी नहीं है। अगर आप सोच रहे हैं कि चार डिजिट का पिन या आड़ी तिरछी रेखाएं खींचकर सब कुछ छिपा सकते हैं तो यह गलतफहमी है। आप अपने मोबाइल से कुछ भी करते हैं/ उसमें कुछ भी रखते हैं तो वह कहीं न कहीं दर्ज हो रहा है। आप कुछ भी सर्च करते हैं तो उसका लिंक आपके होम पेज पर बना रहता है। कोई भी एप डाउनलोड करते समय भी फोटो, कॉन्टैक्ट व मैसेज एक्सेस करने की परमीशन आप ही देते हैं।

आपने कभी गौर किया है कि किसी व्यक्ति के बात करने पर ही फेसबुक पर फ्रेंड सजेशन लिस्ट में उसका नाम दिखने लगता है। किसी उत्पाद की बात करने पर यूट्यूब और फेसबुक पर उससे संबंधित वीडियो व पेज नजर आने लगते हैं। यह संयोग नहीं है बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से स्मार्टफोन की जासूसी है। स्मार्टफोन का माइक्रोफोन 24 घंटे आप की बातों को सुनकर सर्वर पर संरक्षित करता है और उसे इंटरनेट प्रदाता कंपनियां विभिन्न कंपनियों को बेच देती हैं। इसके बाद आपके पास विज्ञापनों और वीडियो की लाइन लग जाती है।

नया बिजनेस मॉड्यूल है यह

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन साइबर क्राइम एंड साइबर लॉ के चेयरमैन अनुज अग्रवाल कहते हैं कि इसमें चौंकने वाली कोई बात नहीं है। दरअसल, यह नामी कंपनियों की नए बिजनेस मॉड्यूल का हिस्सा है। जो कुछ आपको लगता है कि आप फ्री में पा रहे हैं उसके लिए कंपनियों ने मोटा निवेश किया है। अब इस बिजनेस मॉडल के जरिए उसको वसूला जा रहा है। वॉइस टू टेक्स्ट और विभिन्न एप्लीकेशन इसके टूल हैं।

खुद ही देते अपनी बात सुनने की इजाजत : डॉ एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) के सेंटर आफ एडवांस स्टडीज के निदेशक प्रो. मनीष गौड़ बताते हैं बताते हैं कि एप का इस्तेमाल करने के लिए उनकी कई सारी शर्तें माननी होती हैं। ये एप सामान्य तौर पर फोटो गैलरी, कॉन्टेक्ट्स, एसएमएस आदि का एक्सेस मांगते हैं। कई एप आपसे माइक्रोफोन की परमिशन भी मांगते हैं। मतलब जो भी आप बातचीत कर रहे हैं, इसकी जानकारी उनके पास होती है। 

गूगल भी कर चुका स्वीकार

प्रो मनीष गौड़ कहते हैं कि इंटरनेशनल मीडिया में आई रिपोर्ट के अनुसार गूगल ने माना है कि ओके गूगल इस्तेमाल करने पर डेटा रिकार्ड किया जाता है। वेबसाइट, एप्स, लोकेशन से संबंधित डेटा का प्रयोग विज्ञापन दिखाने के लिए किया जाता है। एक और नामी कम्पनी ने भी पिछले दिनों माना था कि यदि उपभोक्ता खुद वॉयस रिकग्निशन के लिए हामी भरे तो ये डेटा थर्ड पार्टी तक, सर्वर के जरिये पहुंच सकता है।

एंड्रॉएड फोन से जासूसी ज्यादा आसान : प्रो गौड़ बताते कि सबसे ज्यादा यूजर एंड्रॉएड के हैं। एंड्रॉएड फोन में एप डाउनलोड करते समय ही सभी बातों की इजाजत देनी होती है। आइओएस में ऐसा नहीं है। उसमें जब भी कोई एप माइक्रोफोन इस्तेमाल करना चाहेगा तो उसको इजाजत लेनी होगी। आइफोन की सेटिंग्स में जा कर प्राइवेसी के माध्यम से माइक्रोफोन को ऑफ किया जा सकता है। 

आखिर क्या है आॢटफिशियल इंटेलिजेंस

आॢटफिशियल इंटेलिजेंस के जरिये कंप्यूटर सिस्टम को एक मानव मस्तिष्क के रूप में तैयार किया जाता है। इनमें आवाज को पहचानना और भाषाओं में अनुवाद करना भी शामिल है। अब तो विजुअल परसेप्शन और निर्णय लेने के गुण तक विकसित किये जा चुके हैं।

साइबर एक्सपर्ट जितेंद्र जैन बताते हैं कि मोबाइल फोन पर आप द्वारा लगाया गया लॉक लोकल लॉक है। अगर आपका डेटा कोई ऑपरेटिंग सिस्टम/ ईमेल/ व्हाट्सएप/ फेसबुक समेत अन्य एप्लिकेशन/ सॢवस प्रोवाइडर आसानी से आपका डेटा एक्सेस कर सकते हैं। स्क्रीन लॉक सिर्फ स्क्रीन के अन्दर जाने में रोकने का काम करता है।

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