नई दिल्ली (राजेश उपाध्याय)। भारत में हम देवियों की पूजा करते हैं। रानी लक्ष्मी बाई - दुर्गावती की बहादुरी को नमन करते हैं। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष, केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और गवर्नर सहित सभी उच्चतम पदों को सुशोभित करने वाली महिलाओं पर गर्व करते हैं। लेकिन हम छोटे गांव - कस्बे से लेकर महानगरों में रहने वाली मां, बहन-बेटियां को आज भी पूरी सुरक्षा नहीं दे पाए हैं। किसी शहर में सुरक्षा की स्थिति थोड़ी ठीक है तो कहीं बहुत ख़राब। महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा एक बड़ी समस्या है, जिससे आज भारत का सामना हो रहा है।

असल में भारत में नागरिकों की सुरक्षा और कानून व्यवस्था की स्थिति अब भी हमारी एक बड़ी चिंता का विषय है। इसकी बड़ी वजह है भारत में नागरिक और पुलिस का अनुपात बहुत कम होना। किसी भी सभ्य समाज की पहली शर्त बेहतर सुरक्षा - कानून व्यवस्था है। और, हमारे शहर इस मामले अभी तक पूरी तरह सभ्य नहीं कहे जा सकते।

महिला सुरक्षा को बड़ा तत्व मानते हुए आध्यात्मिक गुरु स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि किसी भी देश की प्रगति का सबसे बेहतर पैमाना यह है कि वह देश अपनी महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार करता है। हालांकि देश में महिलाओं के खिलाफ काफी संख्या में अपराध देखे गए है। 

 

दिल्ली के निर्भया कांड से पूरा देश स्तब्ध हो गया था। उसी के बाद महिलाओं के खिलाफ रेप जैसे अपराध के लिए काफी कड़ा कानून है। महिलाओं के खिलाफ अपराधों से निपटने लिए निर्भया फंड बनाया गया है जिसका इस्तेमाल महिलाओं की सेफ्टी के लिए किया जा रहा है।

महिलाओं के खिलाफ बढ़ रहे क्राइम पर समाजशात्रियों का कहना है कि पुरुषों को महिलाओं की सुरक्षा के लिए अपना नजरिया बदलने की जरूरत है। इसकी शुरुआत घर से करना होगी। शहरों में यह समस्या ज्यादा होती है क्योंकि पुरुषों को विशाल आबादी में सामाजिक प्रताड़ना का भी डर नहीं होता। उन्हें लगता है कि उनके अपराध पर किसी परिचित की नजर नहीं है। हमें लोगों को जागरुक करने की जरूरत है। ताकि, ऐसे जघन्य अपराधों पर लगाम लगाई जा सके।

वैसे तो सुरक्षा राज्यों का विषय होता है पर केंद्र व राज्यों और राज्यों के बीच आपसी तालमेल से ही नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। यह अच्छी बात है कि सरकार पुराने पड़ गए कानूनों को खत्म कर रही है पर बदलते समय के मुताबिक नए कानूनों की भी जरूरत है। क्योंकि अपराध की प्रकृति बदल गई है। साइबर अपराध बढ़ गए हैं, आर्थिक अपराधों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है और रिश्तों से जुड़े अपराध बढ़ रहे हैं। इनसे निपटने के लिए पुलिस को नए तरह के प्रशिक्षण की जरूरत है।

भारत में प्रति एक लाख पर अपराध की दर 28 फीसदी तक बढ़ने की खबर है तो दूसरी ओर इसी अनुपात में पुलिसकर्मियों की कमी है। भारत में प्रति लाख लोगों पर 193 होने चाहिए जबकि यह 151 पुलिसकर्मी हैं। हत्या, लूट और बलात्कार की घटनाओं में बेहिसाब बढ़ोतरी हुई है।

भारत के शहरों में अपराध बढ़े हैं लेकिन सरकार सीसीटीवी का नेटवर्क बनाकर अपराधों को काबू करने की कोशिश कर रही है। डिजिटल क्राइम को भी काबू करने के लिए सरकार ने कानून बनाए हैं और उन्हें उन्नत तकनीक का इस्तेमाल करके काबू करने की कोशिश की जा रही है।

इकोनॉमिस्ट की 2017 सेफ सिटीज इंडेक्स के अनुसार सुरक्षा के लिहाज से कुछ एशियाई शहर इंडेक्स के शीर्ष पर बने रहे हैं: टोक्यो, सिंगापुर और हांगकांग तो वहीं ढाका, इस्लामाबाद और कराची इस सूची में सबसे नीचे हैं। भारतीय शहर इतनी बदतर स्थिति में नहीं हैं लेकिन हमारे पास गर्व करने की भी वजह नहीं है।

बेशक सुरक्षा का सम्बन्ध शहरों की सम्पन्नता से जुड़ा हुआ है लेकिन उच्च आय वाले अरब शहरों की रैंकिंग गिर रही है। इसलिए केवल आर्थिक सम्पन्नता ही सुरक्षा को नियंत्रित करने वाला एकमात्र कारक नहीं है। सामूहिक प्रयास भी उतने ही आवश्यक हैं। आइए देखते हैं ,अब आपके शहर में सुरक्षा की क्या हालत है ? यहाँ सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े कुछ बुनियादी प्रश्न हैं, जिनके आधार पर आपको तय करना है कि आपका शहर इन मानकों पर कहाँ ठहरता है? 

1. आपका शहर महिला, बच्चों और बुजुर्गों के लिए कितना सुरक्षित है?
2. आपका शहर अकेली महिलाओं के रात में सफर करने को लेकर कितना सुरक्षित है (शाम सात बजे के बाद) ?
3. आपके शहर में रोजमर्रा के अपराध जैसे चेन खींचने या जेब काटने की घटनाएं कितनी आम हैं?
4. आपके शहर में गुंडागर्दी / फिरौती जैसी घटनाएं कितनी आम हैं?
5. आपके शहर में कोई समस्या होने पर घटनास्थल पर पहुंचने या प्रतिक्रिया देने के मामले में पुलिस कितनी प्रभावी है?
6. सड़क सुरक्षा और ट्रैफिक जाम के मामले में आप अपने शहर को कैसा मानते हैं?
7. सीसीटीवी से निगरानी के मामले में आप अपने शहर को कैसा मानते हैं?

By Nandlal Sharma