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    मथुरा हिंसा : पत्रकारिता में था शहीद एसपी मुकुल द्विवेदी का रुझान

    By Ashish MishraEdited By:
    Updated: Fri, 03 Jun 2016 02:50 PM (IST)

    मथुरा में अतिक्रमणकारियों से मोर्चा लेते शहीद हुए एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी को पिता और ताऊ से देश सेवा की प्रेरणा मिली थी। डीजीपी रहे ताऊ के नक्शेकदम पर चल कर वह पीपीएस बने थे।

    लखनऊ। मथुरा में अतिक्रमणकारियों से मोर्चा लेते शहीद हुए एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी को पिता और ताऊ से देश सेवा की प्रेरणा मिली थी। डीजीपी रहे ताऊ के नक्शेकदम पर चल कर वह पीपीएस बने थे। 1998 बैच के पीपीएस मुकुल के ताऊ महेशचन्द्र द्विवेदी प्रदेश के डीजीपी रहे हैं जबकि पिता ने बीडीओ रहते जनता की सेवा की। शहीद मुकुल का गांव औरैया की बिधूना तहसील के गांव मानी कोठी गम में डूबा है। गांव में रहने वाले उनके माता-पिता कल देर रात ही मथुरा के लिए रवाना हो गए थे।

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    शहीद के बारे में खास बातें

    शहीद मुकुल द्विवेदी साल 2008-2009 में बुलंदशहर में सीओ सिटी थे। मुकुल जी का व्यवहार सभी को उनसे जोड़े रखता था। वारदात का वक्त कुछ भी हो, वो अलर्ट रहते थे और अक्सर पत्रकारों से पहले मौके पर मौजूद मिलते थे।

    गांव से सपूत की शहीदी की खबर देर रात ही विधूना थाने की पुलिस लेकर गांव पहुंच गयी। गांव में मुकुल के पिता श्रीचन्द्र, उनकी माता मनोरमा देवी और एक नौकर ही रहते हैं। भाई प्रफुल्ल दुबे दुबई में नौकरी करते हैं। देर रात खबर पहुंचते ही गांव के तमाम लोग शहीद के घर जमा हो गए, सुबह पूरे गांव को अपने सपूत के बारे में पता चल गया। घर में भले कोई नहीं था लेकिन सुबह कुछ देर के लिए पूरा गांव मुकुल के घर से सामने इक_ा हो गया। गम में डूबे पूरे गांव ने नम आखों से उनकी बहादुरी को याद किया, फिलहाल उनके अकेले घर पर पुलिस तैनात कर दी गयी है।

    पत्रकार बनना चाहते थे मुकुल द्विवेदी

    औरेया के रहने वाले मुकुल द्विवेदी का रुझान पत्रकारिता में भी था। वे अक्सर कहते थे कि पुलिस में ना आता तो पत्रकार होता। यूपी पुलिस की जैसी छवि अमूमन दिखती है, वे उसके विपरीत थे। मृदुभाषी थे और जनता के लिए हमेशा उपलब्ध थे। पुलिस के काम करने के तरीकों को वो अक्सर बदलना चाहते थे लेकिन वर्तमान व्यवस्था में ये मुमकिन नहीं है इस बात से भी वाकिफ थे। वो अपनी ओर से हर ईमानदार कोशिश करते थे ताकि पीडि़त मदद मिल सके। साल 2000 में ही उन्होंने पुलिस ज्वाइन की थी। अपने 16 साल के करियर में उन्होंने हमेशा वर्दी का मान रखा। डिप्टी एसपी से एडिश्नल एसपी बने तो भी व्यव्हार नहीं बदला।