लखनऊ [अम्बिका वाजपेयी]। चौंक गए न? ऐसा कुछ होने नहीं जा रहा, यह महज कल्पना है। अंग्रेजी में अजान नहीं हो सकती और कोई मौलाना आपका हवन नहीं करा सकता। इसलिए नहीं करा सकता, क्योंकि लोग कहते हैं धर्म की भाषा होती है। जी हां, वही भाषा जो आचमन और वजू को परिभाषित करती है। अच्छा आपको फिरोज खान तो याद ही होंगे? अरे, वही जिनकी नियुक्ति को लेकर बीएचयू में कई दिन बवाल चला। मसला वही कि कोई मुस्लिम आपको कर्मकांड कैसे सिखा सकता है, क्योंकि धर्म की तो भाषा होती है। क्या धर्म की कोई भाषा होती है या हो सकती है?

इसी सवाल को समर्पित था संवादी का सत्र धर्म की भाषा। संचालक सद्गुरु शरण अवस्थी ने अयोध्या मामले के पक्षकार हाशिम अंसारी और रामचंद्रदास परमहंस की दोस्ती का उदाहरण सामने रखते हुए कहा कि मतभेद होने के बावजूद दोनों में मनभेद न होना बताता है कि प्यार की भाषा के आगे धर्म की भाषा मायने नहीं रखती। दोनों के बीच लखनऊ पेशी पर आने के दौरान किराया देने को लेकर होने वाली नोकझोंक उस भाषा के दायरे से बाहर थी। अयोध्या मसले पर पर राजनीतिक दलों ने बहुत सियासी चालें चलीं लेकिन हाशिम और रामचंद्र दास के ताश पत्ते अपनी ही चाल चलते रहे।

सवाल के बाद मुस्लिम धर्मगुरु खालिद रशीद फरंगी महली ने गंगा-जमुनी तहजीब का उदाहरण देते हुए फिरोज खान मसले को बेवजह तूल देने की बात कही। उनका कहना था कि ऐसा किसी संविधान में नहीं लिखा कि मुस्लिम प्रोफेसर संस्कृत नहीं पढ़ा सकता। अगर यह विरोध न होता तो शायद भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि विदेश में और मजबूत होती। किसी भाषा को धर्म से जोडऩा ठीक नहीं। हालांकि एकेटीयू के कुलपति विनय पाठक ने क्लियर किया कि विरोध फिरोज द्वारा संस्कृत नहीं बल्कि वैदिक कर्मकांड पढ़ाने को लेकर था। यहां संकट स्वीकार्यता का था, जिसने जिस अनुभव को जिया नहीं उसे प्रतिपादित कैसे कर सकता है। 

क्या आचार्य के लिए निर्धारित नियम और संयम का पालन फिरोज खान कर पाते। इस तरह तो आप कथा, हवन और पूजन यूट्यूब से भी कर सकते हैं। उन्होंने सवाल भी उठाया कि क्या कोई गैर मुस्लिम इस्लाम के सारे धर्मग्रंथ और उपासना पद्धति सीखकर नदवा में टीचर बन सकता है। तालियों ने जरूर सहमति जताई पर फरंगी महली ने नहीं। अब बारी थी अधिवक्ता रिजवान अहमद की, जिन्होंने वंदेमातरम कहने पर तालियां बजाने वालों को यह कहकर खामोश किया कि वंदेमातरम तो उनके खून में है। मेरे मजहब में मान्यता नहीं है लेकिन मेरी इच्छा है कि अगले सात जन्म मेरे भारत में हों।

हालांकि, इसके बाद रिजवान अहमद ने तालियों के साथ महफिल भी लूटी। उन्होंने भी विनय पाठक की बात को आगे बढ़ाया कि हदीस और कुरान के विद्वान किसी हरि प्रकाश चतुर्वेदी को क्या नदवा में पढ़ाने का मौका मिल सकता है। दोस्तों के साथ गंगा स्नान करने वाले रिजवान अहमद ने पूरी साफगोई से कहा कि अगर हिंदू टोपी लगाकर रोजा इफ्तार करता है तो मुस्लिम को भी मां की चुनरी ओढ़कर जागरण में भाग लेना चाहिए। धर्म की भाषा होती है और परिस्थितियों के अनुसार होती है। अरबी कुरान की शक्ल में और संस्कृत श्लोक बनकर सामने आती है तो धर्म की भाषा ही तो बोलती है। आप अंग्रेजी में अजान नहीं कर सकते तो फिरोज खान कर्मकांड कैसे पढ़ा सकते हैं। देश का सबसे ज्यादा नुकसान तथाकथित धर्मनिरपेक्षता और कट्टरता ने किया है। भारत तबसे धर्मनिरपेक्ष है जब कुरान शरीफ का प्राकट्य भी नहीं हुआ था।

कुछ संविधान रचयिता मानवों ने धर्मनिरपेक्ष शब्द को जन्म दिया। हम उन्हें एररलेस नहीं कह सकते। खालिद रशीद फरंगी महली ने तर्क दिया धर्मनिरपेक्षता का मतलब यह नहीं कि हम आपके धर्म में आएं और आप हमारे। इस पर रिजवान अहमद ने असहमति जताते हुए कहा कि किसी जागरण में जाकर प्रसाद लेने से किसी का धर्म नहीं बदल जाता। कुलपति विनय पाठक ने खालिद रशीद फरंगी महली के उस सवाल को निस्तारित किया कि संविधान में कहीं नहीं लिखा कि मुस्लिम संस्कृत नहीं पढ़ा सकता। पाठक ने कहा कि अनुभव का विकल्प नहीं होता इसलिए जो जिसका काम होता है उसी को शोभा देता है। धर्म की भाषा का मर्म यही है कि जो भाषा इंसान को इंसान से लड़ाए वो कतई किसी धर्म की नहीं हो सकती।

मुशर्रफ और मोनू को भी याद रखिए

आपको फिरोज खान याद हैं लेकिन मुशर्रफ और मोनू नहीं। इसलिए क्योंकि जो काबिले जिक्र बात होती है, उसका जिक्र भी नहीं होता, क्योंकि आपकी उदासी पर मुस्कराने वाली सियासत के लिए फिरोज खान ज्यादा बड़ा मुद्दा थे। कुछ दिन पहले दिल्ली की फैक्ट्री में आग लगी। वहां मरने वाले 43 लोगों में एक था मुशर्रफ। लपटों में घिरा मुशर्रफ मौत सामने देखकर अपने दोस्त मोनू अग्रवाल से फोन पर कहता है कि मैं मरने वाला हूं दोस्त, मेरे बच्चों और परिवार का ख्याल रखना। मुशर्रफ ने ऐसे हाथों में अपने बच्चों को सौंप दिया जो दुआ की जगह प्रार्थना के लिए जुड़ते हैं। वो शख्स उसके मजहब का भी नहीं था। मोनू ने भी  मुशर्रफ के परिवार का जीवनभर ख्याल रखने का प्रण लिया। अब मुशर्रफ के बच्चों को मोनू कौन से धर्म की भाषा सिखाएगा। इस पर चर्चा कीजिए और खूब कीजिए, भरोसे के रिश्ते के मर्म को समझिए। इस मर्म की अलग भाषा होती है। अपने धर्म को मानिए और दूसरे धर्म की इज्जत करिए, क्योंकि धर्म आपसे पहले भी था और आपके बाद भी रहेगा।

Posted By: Divyansh Rastogi

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