लखनऊ, जेएनएन। विलुप्ति के कगार पर पहुंचे गिद्धों को संरक्षित करने और उनकी संख्या बढ़ाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार जटायु संरक्षण व प्रजनन केंद्र बनाएगी। राज्य के योगी सरकार यह केंद्र महराजगंज में बनाना चाहती है। हालांकि वहां यह केंद्र कितना मुफीद होगा, इस पर बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) के विशेषज्ञ जल्द अपनी रिपोर्ट सरकार को देंगे। जटायु संरक्षण व प्रजनन केंद्र की स्थापना भी वन्यजीव अनुसंधान संगठन और बीएनएचएस साझा तौर पर करेंगे। बीएनएचएस ने हाल ही में प्रदेश में गिद्धों की स्थिति पर एक सर्वेक्षण किया है। जल्द ही इसकी रिपोर्ट सरकार को सौंपी जाएगी।

भारत में गिद्धों की नौ प्रजातियां पाई जाती हैं, लेकिन तीन प्रजातियां व्हाइट बैक्ड, लॉन्ग बिल्ड व सिलेंडर बिल्ड भारतीय वन्य जीव अधिनियम की अनुसूची-एक के तहत संरक्षित हैं। उत्तर प्रदेश में बनने वाले इस केंद्र में गिद्धों का प्रजनन व संरक्षण होगा। इसे लखनऊ के कुकरैल स्थित घड़ियाल संरक्षण व प्रजनन केंद्र की तर्ज पर तैयार किया जाएगा। इसका जिम्मा बीएनएचएस को सौंपा गया है। केंद्र स्थापित करने से पहले गिद्धों के प्राकृतिक आवास का मूल्यांकन भी कराया गया है। उधर बीएनएचएस ने जटायु संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र की स्थापना के लिए विस्तृत अध्ययन कर लिया है। यह प्रदेश का पहला जटायु संरक्षण केंद्र होगा।

सर्वेक्षण से यह पता चलेगा कि गिद्धों की कौन सी प्रजाति सबसे ज्यादा खतरे में हैं। सर्वेक्षण में जीआइएस मैपिंग का भी इस्तेमाल किया गया है, ताकि गिद्धों की सही संख्या का पता लग सके। यह अपने तरह का पहला वैज्ञानिक आकलन होगा। प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्य जीव सुनील पांडेय ने बताया कि बीएनएचएस के साथ जटायु संरक्षण केंद्र को लेकर 22 जुलाई को बैठक रखी गई है। इसमें संरक्षण केंद्र के दिशा-निर्देश तय होंगे। उन्होंने बताया कि इस केंद्र में गिद्धों के अंडे लाकर उसे प्राकृतिक तरीके से रखकर हैचिंग कराई जाएगी। गिद्धों के बच्चे जब बड़े हो जाएंगे तो उन्हें जंगलों में छोड़ दिया जाएगा।

नेपाल से आते रहते हैं गिद्ध : नेपाल के बुटवल में जटायु संरक्षण केंद्र है। वहां से महराजगंज व कुशीनगर में गिद्ध आते रहते हैं। कुशीनगर के सेवरही में अप्रैल व खड्डा में मई में जीपीएस लगे गिद्ध गिरे मिले थे। अप्रैल में भी महराजगंज के सोनौली में नेपाल से आया गिद्ध मिला था। बुटवल से कुशीनगर करीब 150 किलोमीटर, महराजगंज 120, खड्डा 180 और सोनौली करीब 60 किलोमीटर दूर है।

प्राकृतिक पर्यावरण संरक्षक होते हैं गिद्ध : गिद्ध प्राकृतिक पर्यावरण संरक्षक होते हैं। यह ऊंचाई पर उड़ते हुए मृत जानवरों को विशेष रूप से पहचान लेते हैं। यह तेजी से वहां पहुंचकर वातावरण को विषैला होने से पहले यानी मृत जानवर के शरीर से गंदी गैस व बदबू आने से पहले ही उसके मांस को खाकर सफाई कर देते हैं। गिद्ध केवल मृत जानवरों को ही खाते हैं। इसलिए इन्हें प्राकृतिक पर्यावरण संरक्षक कहा जाता है।

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