लखनऊ [दुर्गा शर्मा]। Happy Mothers Day 2021: दर्द और तकलीफ में अनायास ही जो शब्द मुंह से निकले है- वह मां है। दर्द और राहत का यह रिश्ता कोरोना काल में लगभग हर घर में देखने को मिला। कोरोना संक्रमण के साये में मां घर और बाहर की जिम्मेदारी बखूती निभाती रही। मदर्स डे पर कुछ ऐसी ही मांओं से मिलवाते हैं...

बेटी पॉजिटिव, पर बिना छुट्टी लिए मां निभाती रहीं जिम्मेदारी: हजरतगंज महिला थाना इंस्पेक्टर सुमित्रा देवी के मुताबिक, एक इंसान के लिए मां और पिता दोनों की ही भूमिका का निर्वहन करना दुर्लभ काम है। मैं दृढ़ता से दोनों ही दायित्वों को निभा रही थी, पर 27 अप्रैल का वह दिन आया, जब मैं कुछ पल के लिए कमजोर पड़ गई। हाथ में बेटी की कोरोना पॉजिटिव रिपोर्ट थी। बच्चों के सामने रो भी नहीं सकती थी, पर अकेले में खूब रोई। बार-बार यही सोचती कि कैसे अपनी फूल सी बेटी प्रिया को इस महामारी की चपेट से बचा लूं। घर पर बेटी के अलावा बेटा आशुतोष भी है। ड्यूटी भी करनी है। खुद से कहा कि मैं कमजोर नहीं पड़ सकती। बेटी के लिए होम आइसोलेशन में जरूरी हर चीज का प्रबंध किया। बेटे आशुतोष ने भी खूब परिपक्वता दिखाई। इस दौरान मैं अपनी ड्यूटी भी करती रही। महिला थाना पर आने वाली शिकायतों का सुनने के साथ ही फील्ड ड्यूटी भी की। पांच मई को बेटी की निगेटिव रिपोर्ट देखकर सुकून भरी सांस ली और ईश्वर को शुक्रिया कहा।

कोरोना पॉजिटिव बेटी को दी धैर्य की सीख: झलकारी बाई अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षिका डा रंजना खरे के मुताबिक, मैं और पति लखनऊ में रहते हैं। एक बेटी आंध्र प्रदेश तो दूसरी कर्नाटक में है। बेटी अपूर्वा आंध्र प्रदेश में मेडिकल फाइनल ईयर की छात्रा है। 25 अप्रैल को बेटी ने बताया कि उसकी कोविड रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। मां-बाप के लिए इससे कठिन समय नहीं हो सकता कि बच्चों को उनकी जरूरत हो और वह उनके पास नहीं पहुंच पाएं। मां का दिल है, परेशान तो होगा ही, पर मैंने बेटी से बहुत संयत होकर बात की। टेलीफोनिक टच बना रहा। धैर्य से काम लिया और बेटी को भी यही सीख दी। बेटी की चिंता बनी रहती, पर इस दौरान अस्पताल और मरीजों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी निभाती रही। करीब एक सप्ताह बाद बेटी की निगेटिव रिपोर्ट ने हमें बहुत राहत दी।

दस दिन तक आधी अधूरी नींद के साथ गुजरती रहीं रातें:  यूपी पुलिस रिक्रूटमेंट एंड प्रमोशन बोर्ड की एडिशनल एसपी रश्मि श्रीवास्तव के मुताबिक, मैं और पति दोनों ही पुलिस विभाग से जुड़े हैं। पावनी और लहर हमारी दो बेटियां हैं। मैं याद नहीं करना चाहती, फिर भी कोरोना की पहली लहर में बीता अगस्त महीना स्मृति पटल पर ताजा हो जाता है। तब मुझे छोड़कर घर पर सभी कोरोना पॉजिटिव हो गए थे। सबसे पहले पति, फिर सास ससुर और उसके बाद दोनों बेटियां कोरोना पॉजिटिव हो गईं। यह पहला मौका रहा, जब बेटियां आइसोलेट थीं और उन्हें मेरे बिना नींद नहीं आ रही थी। दस दिन तक आधी अधूरी नींद के साथ रातें गुजरती गईं। फिर बेटियों की रिपोर्ट निगेटिव आई और हमने राहत की सांस ली। इस अनुभव ने हमें इस बार घर पर भी शत प्रतिशत कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करने की सीख दी। मेरी मां स्व उमा रानी और सासू मां तारा सिन्हा ने हमेशा आत्मनिर्भर बनने की सीख दी है, वही शिक्षा मैं अपनी बेटियों को भी देती हूं। आइसोलेशन भी एक तरह से आत्मनिर्भर बनने की पाठशाला जैसा है। आपको हर छोटे-बड़े काम खुद करने पड़ते हैं। मैंने जो सीखा, वही बेटियों को सिखाया और इसी सीख से वह दोनों कोरोना का हरा पाईं।

 

बच्चों के साथ मिलकर कोरोना को हराया: मिडलैंड हॉस्पिटल के एनआइसीयू इंचार्ज डॉ पूर्वी के मुताबिक, मैं और पति दोनों ही डॉक्टर हैं। हमारे दो छोटे बच्चे वानी और वरेण्यम हैं। हम हर रोज तमाम मरीजों को देखते हैं, पर जब कोरोना संक्रमण हमारे घर तक पहुंचा, अपनों को चपेट में लिया तो हम भी घबराए। फिर अगले ही पल खुद को समझाया कि यह वक्त कमजोर पड़ने का नहीं है। कोरोना के लक्षण दिखने पर मैं और सासू मां पांच दिन अस्पताल में भर्ती रहे। डिस्चार्ज होने के कुछ दिन बाद ही सासू मां को दोबारा दिक्कत होने लगी, उन्हें फिर भर्ती कराया गया। इस दौरान बेटी वानी भी पॉजिटिव हो गई। घर पर मैं और दोनों बच्चे आइसोलेट रहे और पति ने अस्पताल में मां की देखभाल की। बच्चे इतने छोटे हैं कि वह जानलेवा वायरस के बारे में समझ भी नहीं सकते। 25 दिन घर पर कोई नहीं आया, बस मैं और दोनों बच्चे...। सकारात्मक सोच के साथ मैंने बच्चों को कोरोना से लड़ना और जीतना सिखाया।

बच्चों को नानी-नानी के पास छोड़ने की मजबूरी: केजीएमयू डीपीएमआर सीनियर प्रोस्थेटिस्ट एवं प्रभारी वर्कशॉप शगुन सिंह के मुताबिक, मेरी ड्यूटी केजीएमयू के आरएलसी कोविड अस्पताल के दिव्यांग वर्कशॉप में है। कई दिव्यांग हमारी तरह देश की सेवा कर रहे और उनकी सेवा के लिए हम कटिबद्ध हैं। मेरे दो छोटे बच्चे हैं- 12 साल की बेटी अविका और सात साल का बेटा अभ्युदित। पति भी चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े हैं। कोरोना महामारी के बीच हम मरीजों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से भी नहीं भाग सकते और बच्चों का ख्याल तो प्राथमिकता है ही। ऐसे में हम अपने दोनों बच्चों को नाना-नानी के पास छोड़कर काम पर जाते। बच्चों की जिंदगी मां के इर्द-गिर्द घूमती है। उनके खाने-पीने से लेकर हर छोटी बड़ी चीज का ध्यान रखना होता है। संक्रमण के बीच उन्हें सुरक्षित रहने का तरीका भी सिखाना होता है। हम संयम के साथ अपने हर दायित्व को निभा रहे।

Edited By: Divyansh Rastogi