लखनऊ, जागरण संवाददाता। हर वर्ष की 21 मार्च और 23 सितंबर को दिन-रात बराबर होते हैं। इस दिन बारह घंटे का दिन और बारह घंटे की रात होगी। सूर्योदय और सूर्यास्त भी एक ही समय होता। यह इसलिए ऐसा होता है कि 21 जून को दक्षिणी ध्रुव सूर्य से सर्वाधिक दूर रहता है, इसलिए इस दिन सबसे बड़ा दिन होता है। पृथ्वी के मौसम परिवर्तन के लिए वर्ष में चार बार 21 मार्च, 21 जून, 23 सितंबर व 22 दिसंबर को होने वाली खगोलीय घटना जीवन को प्रभावित करती है।

आचार्य एसएस नागपाल ने बताया कि गुरुवार को खगोलीय घटना में सूर्य उत्तर गोलार्ध से दक्षिण गोलार्ध में प्रवेश के साथ उसकी किरणे तिरछी होने के कारण उत्तरी गोलार्ध में मौसम में सर्द भरी रातें महसूस होने लगी है। सूर्य के उत्तरी गोलार्ध पर विषवत रेखा पर होने के कारण ही 23 सितंबर को दिन व रात बराबर हो गए। खगोलीय घटना के बाद दक्षिण गोलार्ध में सूर्य प्रवेश कर जाएगा और उत्तरी गोलार्ध में धीरे-धीरे रातें बड़ी होने लगेंगी।

आचार्य आनंद दुबे के अनुसार पृथ्वी की मध्य रेखा को भूमध्य या विषवत रेखा कहते हैं। जब सूर्य दक्षिण की ओर अग्रसर होता है, तो दक्षिण गोल सूर्य कहलाता है। जब सूर्य उत्तर की ओर जाता है, तो उत्तर गोल कहलाता है। इन दोनों स्थिति की अवधि छह माह होती है। इसके बाद 22 दिसंबर को शाम सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायन की ओर प्रवेश करता है, इसलिए 24 दिसंबर को सबसे छोटा दिन और सबसे बड़ी रात होती है। तत्पश्चात 25 दिसंबर से दिन की अवधि पुन: बढ़ने लगती है। वैदिक ज्योतिष पद्धति निर्णय सिद्धांत को मानती है। आचार्य शक्तिधर त्रिपाठी ने बताया कि दक्षिणायन सूर्य की स्थिति है जिसमें सूर्य कर्क संक्रांति के बाद से लेकर मकर संक्रांति तक होता है।

 

Edited By: Anurag Gupta