लखीमपुर

लगभग 35 एकड़ के क्षेत्र में फैला अंतर्वेद वन ऋषि मुनियों की तपोस्थली होने के साथ-साथ हमारी धार्मिक मान्यताओं से भी जुड़ा है। क्षेत्र महाभारत कालीन यादें समेटे है। पांडवों के अज्ञातवास के साक्षी इस अंतर्वेद वन में जिले के ही नहीं दूर-दराज के अनेक लोगों की भी गहरी आस्था है। महाभारत काल में द्यूत क्रीड़ा में पराजित पांडवों ने वनवास के बाद अंतिम वर्ष अज्ञातवास का कुछ समय यहां बिताया था। यहां निवास करने वाले संत बताते हैं कि सुरक्षा की ²ष्टि से भीम ने जो चौड़ी खाई खोदी थी। वह अब भी मौजूद है तथा झील का रूप ले चुकी है।

अंतर्वेद आश्रम के वर्तमान महंत बाबा गोकुल दास बताते हैं कि अज्ञातवास काटने आए पांडवों ने यहां काफी माह बिताए। कौरवों का कोई गुप्तचर, जंगली पशु या कोई शत्रु उन तक न पहुंच सके इसके लिए भीम ने चौड़ी गहरी व गोलाकार खाई का निर्माण किया था जो वर्तमान में एक बड़ी झील का रूप ले चुकी है। यहीं से पांडव विराटपुर चले गए थे। इस सघन वन की सुरम्यता को देखते हुए अनेक ऋषि मुनियों ने यहां तपस्या की। अंतर्वेद आश्रम के सबसे पहले महंत बाबा गंगादास पौहारी हुए। जो केवल कंदमूल फल खाकर ही रहते थे। बाबा गोकुल दास बताते हैं कि बाबा गंगादास एक छह पाए वाले तख्त पर बैठते थे, उनके तख्त के पास एक पालतू शेर भी बंधा रहता था। जिसकी वे सवारी भी करते थे। बाबा गंगादास ने आश्रम के पूर्वी भाग में एक बाग लगाई तथा बीच में एक कुंआ खोदवाया। झील के किनारे की कुछ भूमि पर गुफा की शक्ल में एक झोपड़ी बनवाई, जिसमें बैठ कर वे पूजा-पाठ किया करते थे। तत्कालीन झंडीराज्य के राजा ने बाबा गंगादास को आश्रम के लिए 2200 एकड़ जमीन भी दान में दी थी। बाबा गंगादास के ब्रह्मालीन हो जाने के बाद यहां के महंत बाबा ब्रजलाल दास हुए। जिन्होंने इस स्थल की सुरक्षा के लिए चार साधुओं को यहां बुलाया। इन साधुओं को अंतर्वेद वन के चारों कोनों पर नियुक्त किया। वे चारों स्थान भी सिद्ध स्थान के नाम से जाने जाते हैं। जिनमें औघड़ बाबा, फकीर बाबा, डूंड़े बाबा तथा सिद्ध बाबा हैं। महंत बृजलाल दास के बाद यहां रामदयाल दास, भारत दास व शारदा दास महंत हुए। वर्तमान समय में यहां गोकुल दास महंत हैं जिनकी देख-रेख में यहां के मंदिरों व आश्रम का जीर्णोंद्धार कराया गया।

अंतर्वेद आश्रम में राम जानकी व हनुमान जी के मंदिर हैं। पदेन सरवराहकार ही ट्रस्ट का संचालन करता है। महंतों के आवास व आगंतुकों के लिए भी यहां स्थान बना है। सघन व प्राचीन प्राचीन वृक्षों वाले इस इस वन में हिरन, खरगोश तथा अनेक पक्षियों का कलरव है। वहीं शारदा नदी की कल-कल ध्वनि इस वन की नीरवता में मानो चार-चांद लगाती है।