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    स्थापत्य का नमूना है कुंवरि का राजमहल

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    Updated: Fri, 17 Apr 2015 09:12 PM (IST)

    लखीमपुर : जिले के निघासन ब्लॉक का कस्बा ¨सगाही कभी खैरीगढ़ स्टेट के नाम से जाना जाता था। यहां स्थित

    लखीमपुर : जिले के निघासन ब्लॉक का कस्बा ¨सगाही कभी खैरीगढ़ स्टेट के नाम से जाना जाता था। यहां स्थित राजा इंद्र विक्रम शाह का राजमहल प्राचीन स्थापत्थ्य कला का अछ्वुद नमूना है। राजमहल की बनावट देख कर ब्रिटेन में बने महारानी के बर्मिंघम पैलेस की याद आती है। 18वीं शताब्दी में कस्बा ¨सगाही खैरीगढ़ स्टेट की राजधानी थी। राजा इंद्रविक्रम शाह प्रजा पालक व चक्रवर्ती सम्राट के रूप में दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। इसके अतिरिक्त महल में आज भी स्थापत्य कला के इस अछ्वुत नमूने को देखने वालों का दूर-दराज से आवागमन होता है।

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    जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थिति कस्बा ¨सगाही किसी समय खैरीगढ़ स्टेट के नाम से दूर-दूर तक जाना जाता था। खैरीगढ़ रियासत के बारे में माना जाता है कि यह रियासत सूर्यवंशी क्षत्रियों की थी जिसकी स्थापना 15वीं शताब्दी में अकबर के शासन काल में अयोध्या के राजा अर्जुन मल ने की थी। ¨सगाही के राजाओं में राजा रणजोध शाह, राजा इंद्र विक्रम शाह व उनकी पत्नी महरानी सुरथ कुंवारी के नाम काफी प्रसिद्ध है। इस बात का उल्लेख जिले के इतिहासविद डॉ. रामपाल ¨सह की किताब खीरी जिले का इतिहास में मिलता है। इसके मुताबिक स्थापत्य कला के इस अछ्वुत नमूने का निर्माणकाल 1880 से 1920 ई. के बीच का है। देखने में भव्य राजमहल के 12 प्रवेश द्वार है। मुगल काल में ही इसे ¨सगाही भेड़ौरा के नाम से जाना जाता है। राजा प्रसाद की यह सुंदर इमारत 50 फुट ऊंची व 3803200 मीटर के क्षेत्र में बनी है। 1885 में राजा इंद्रविक्रम शाह की अल्पआयु में मृत्यु के बाद महारानी सुरथ कुंवारी ने शासन संभाला। सुरथ कुंवरि को ब्रिटिश सरकार ने शासन व कार्यों एवं प्रजा के प्रति निष्ठावान होने के कारण केसरे ¨हद की उपाधि भी दी थी। रानी सुरथ कुंवारी ने इसी राज महल के आस-पास बाग लगाए, कुंए खुदवाए तथा विद्यालय आदि बनवाकर शिक्षा के प्रसार प्रचार का भी काम किया। उन्होंने अपने पति राजा इंद्र विक्रम शाह की याद में इंद्रेश्वर महादेव की भी स्थापना की जोकि आज भी इस राजमहल से तीन किलोमीटर दूर सरयू नदी के तट पर भव्य मंदिर के रूप में मौजूद है। सन 1927 में बने इस मंदिर में काले पत्थर का शिव ¨लग मौजूद है। जहां सावन के अलावा महाशिवरात्रि पर भी भक्तों द्वारा पूजना अर्चना की जाती है। करीब तीन मीटर ऊंचे चबूतरे पर बना यह इंद्रेश्वर महादेव का अष्ट कोणीय मंदिर भी स्थापत्य कला के लिए काफी अछ्वुत है। इसी मंदिर के चार कोनों पर छोटे-छोटे दरवाजे हैं जो महारानी द्वारा बनवाई गई भूमिगत भूल-भुलौया के प्रवेश द्वार हैं। यह भूल-भुलैया भी सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र है। राजा इंद्र विक्रम शाह की अष्टधातु की मूर्ति भी इसी राजमहल के सामने उद्यान में स्थित है।