कुशीनगर में पर्यटकों को लुभाएगा मियावाकी फारेस्ट
कुशीनगर में बौद्ध विपश्यना केंद्र में जापान के सहयोग से 90 के दशक में विकसित किया गया था 1994 में गोरखपुर के कुस्मही जंगल से लाई मिट्टी पर रोपे गए थे पौधे।

कुशीनगर: कुशीनगर के बौद्ध विपश्यना केंद्र में जापानी तकनीक से रोपित मियावाकी फारेस्ट को प्रशासन द्वारा पर्यटकों को लुभाने के लिए तेजी से विकसित किया जा रहा है। बौद्ध स्थलों के विकास के क्रम में बौद्ध वन विपश्यना केंद्र जापान सरकार के आर्थिक सहयोग से ओवरसीज इकोनामिक कांटिनेंटल फंड (ओईसीएफ) के तहत नब्बे के दशक में विकसित किया गया था।
क्या है मियावाकी तकनीक
यह एक कृत्रिम जंगल होता है। इसमें रोपित पौधे सामान्य पौधों की तुलना में 10 गुना तेजी से वृद्धि करते हैं। इस तकनीक की खोज जापान के हिरोशिमा विश्वविद्यालय के वनस्पति शास्त्री अकीरा मियावाकी ने किया था। इस विधि से 100 वर्ष में विकसित होने वाले जंगल को 10 वर्ष में ही विकसित किया जा सकता है। यह 10 गुना ज्यादा घना भी होता है। कम क्षेत्र में घने वृक्ष आक्सीजन बैंक का कार्य करते हैं।
1994 में लगा था यह जंगल
विपश्यना केंद्र कुशीनगर का जंगल भी कृत्रिम जंगल है। इसमें स्थित शाल के पौधों को 1994 में गोरखपुर के कुस्मही जंगल से लाई मिट्टी का बेड बनाकर और वहीं से लाए गए बीज से पौधे तैयार किए गए थे। वर्तमान में शाल के वृक्ष काफी विकसित हो गए हैं। केंद्र में अन्य प्रजातियों के भी पौधे-पीपल, बरगद, पाकड़, अर्जुन, जामुन, कदम्ब, पाकड़, पुत्रंजीवा आदि लगाए गए हैं।
यह है केंद्र की खूबी
इसमें एकल व समूह विपश्यना, छोटे पदयात्रा, बैठकों का आयोजन भी हो सकता है। 15 एकड़ में फैले इस केंद्र में पोखरों की सफाई, पेयजल, प्रसाधन, फव्वारा, रोड पेंटिग, वृक्षों व पौधों का नामकरण, रेस्टोरेंट, स्थानीय पशु-पक्षियों को आश्रय देने के लिए कार्य प्रारंभ है।
ज्वाइंट मजिस्ट्रेट कसया पूर्ण बोरा ने कहा कि बौद्ध वन विपश्यना केंद्र कुशीनगर मियावाकी फारेस्ट की तर्ज पर ही विकसित है। विकास के लिए यह प्रो-पुअर टूरिज्म डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के तहत चयनित है। उसके पूर्व पर्यटकों की सुविधा के लिए इसे विकसित किया जा रहा है। इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।
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