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    भारत में कब हुई AIR की शुरुआत? World Radio Day पर देखिए आजादी से पहले रेडियो की 6 तस्वीरें, 150 किलो वाला और भी खास

    Updated: Thu, 13 Feb 2025 12:28 PM (IST)

    आज World Radio Day है। हम आपको इस स्टोरी में रेडियो के सफर की कहानी के बारे में विस्तार से जानकारी देंगे। मीडियम वेव रेडियो से लेकर एफएम तक...आकाशवाणी से विविध भारती तक रेडियो ने कैसे बदला मनोरंजन और सूचना का परिदृश्य। जानिए कानपुर में रेडियो के इतिहास और वर्तमान के बारे में। साथ ही देखिए आजादी से पहले चलने वाले रेडियो की छह तस्वीरें।

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    World Radio Day: प्रस्तुति के लिए इस्तेमाल किया गया ग्राफिक

    World Radio Day 2025: ये आकाशवाणी है। विविध भारती का कानपुर केंद्र एफएम 103.7 पर आप सुन रहे हैं...फोन इन प्रोग्राम हेलो कानपुर। मैं हूं आपके साथ रेडियो संगिनी रंजना।

    ऐसे ही भूले-बिसरे गीत, चित्रलोक, हवामहल या देश की सीमा पर मोर्चा संभाल रहे फौजी भाइयों के लिए जयमाला की प्रस्तुति की सुरीली धुन आपने जरूर सुनी होगी। गांव, शहर, नुक्कड़, दुकान से लेकर घरों तक साथ बैठकर क्रिकेट मैदान का आंखों देखा दृश्य सुन अवश्य उछले होंगे। खेत में सिंचाई, बाग में आम की बौर के बीच भीनी खुशबू, सुबह-दोपहर या शाम जरूर मनपसंद गाने सुनते गुजरी होगी। ...जी हां, ये रेडियो है।

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    अब के बुजुर्गों को तब शादी-विवाह में उपहार में रेडियो मिलना बड़ी बात थी। रेडियो जो मीडियम वेव, शार्ट वेव से अब एफएम पर है। उद्घोषक हैं, रेडियो जॉकी हैं। सामुदायिक रेडियो हैं। कार, मोबाइल फोन, कंम्यूटर, टीवी से लेकर कार्यालयों, परिसरों, होटलों, रेस्तरां समेत आधुनिकता की दौड़ में हर कोने तक बालीवुड, पाश्चात्य, भारतीय संगीत व विविध भाषाओं में घुली शोख अदाओं वाली आवाजें कानों के रास्ते सीधे दिल में उतर रही हैं। ''''मन की बात'''' सुनने का भी ये सशक्त माध्यम है। 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस है। परिवर के साथ बैठकर कीजिए फरमाइश व सुन लीजिए अपने मन की तान। पढ़िए, जागरण संवाददाता शिवा अवस्थी की रिपोर्ट...

    रेडियो अब मेट्रो का हाल भी बता रहा है। जैसे मोतीझील से मेट्रो का समय इतना है...आइआइटी स्टेशन से आई मेट्रो रावतपुर स्टेशन से गुजर चुकी है। 10 लाख से अधिक लोग पूरे दिन अपडेट रहते हैं। आइआइटी कानपुर में अपना कम्युनिटी रेडियो स्टेशन 90.4 को छात्र व प्रोफेसर सुनते हैं। आसपास ग्रामीण परिवेश के तमाम छात्र इसे सुनते हैं।

    (1933 में बना रेडियो । जागरण)

    कानपुर देहात में भी कम्युनिटी रेडियो है। 92.7 बिग एफएम, रेडियो मिर्ची 98.3 एफएम, एआइआर रेनबो, रेडियो सिटी, फीवर 95.5 एफएम, रेडियो ज्ञानवाणी 104 एफएम, ऑल इंडिया रेडियो आकाशवाणी (विविध भारती) एआइआर कानपुर 103.7 एफएम, रेडियो कनपुरिया, वक्त की आवाज जैसे रेडियो स्टेशन भी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, तमिल, मलयालम, तेलगू जैसी अलग-अलग भाषाओं में हैं। कानपुर आकाशवाणी से विविध भारती का कवरेज क्षेत्र लगभग 15,386 वर्ग किमी है। एफएम रेनबो का विस्तार 2826 वर्ग किलोमीटर तक है। कानपुर देहात, उन्नाव, औरैया, उरई, जालौन, इटावा तक कवरेज क्षेत्र है।

    (1932 का एक स्टेशन वाला रेडियो । जागरण)

    कुछ खास बातें (History of Radio)

    • 1900 में गुग्लील्यमो मार्कोनी ने इंग्लैंड से अमेरिका में व्यक्तिगत रेडियो संदेश भेजा।
    • 24 दिसंबर 1906 की शाम से रेडियो के प्रसारण की शुरुआत हुई।
    • 1918 में न्यूयॉर्क के हाइब्रिज में दुनिया का पहला रेडियो स्टेशन बना।
    • 1937 में ऑल इंडिया रेडियो शुरू हुआ (History of All India Radio), 88 वर्ष पूरे होने को हैं।
    • 1963 में कानपुर में विविध भारती सेवा का शुभारंभ हुआ।
    • 1970 में कानपुर केंद्र को विज्ञापन सेवा केंद्र बनाया गया।
    • 2006 में 102 मेगाहर्ट्ज फ्रीक्वेंसी पर एफएम रेनबो का प्रसारण शुरू।
    • 2012 से एफएम मोड से ही विविध भारती का प्रसारण शुरू।

    युवाओं पर फोकस, जैसा भाव वैसी बात

    आकाशवाणी की उद्घोषक रंजना यादव बताती हैं, पुराने कार्यक्रमों में अब भी फरमाइशें हैं। बस जरिया बदला है। फोन के बजाय ईमेल, एसएमएस से फरमाइश बता रहे हैं। फौजी भाइयों के कार्यक्रम जयमाला के साथ अब सेलिब्रेटी आते हैं, जो वीर सैनिकों के बारे में बताते हैं। गुड इवनिंग कानपुर, गुड मार्निंग कानपुर जैसे कार्यक्रमों में यातायात, भोजन से लेकर स्थलों के बारे में बताते हैं। हेलो कानपुर के प्रसारण में साक्षात्कार भी होते हैं। युवाओं के सुझाव के आधार पर उनसे जुड़े कार्यक्रम व पसंद पर फोकस है।

    (1940 का रेडियो । जागरण)

    पर्दे के पीछे...प्रसारण अधिकारी व इंजीनियर

    शुरुआत में रिकार्ड करने के बाद प्रस्तुति दी जाती थी। कई बार अचानक बीच में रुकावट आ जाती थी। टेप आगे या पीछे तक भी चल जाते थे। थोड़ी देर के लिए कुछ सुनाई नहीं पड़ता था। पर्दे के पीछे के तब भी प्रसारण अधिकारी, इंजीनियर व जानकार कर्मी होते थे और अब भी हैं। सेट बड़े-बड़े होते थे। अब तकनीक बढ़ी है। कार्यक्रमों की गुणवत्ता सुधरी है। विचार, विषय वस्तु, थीम पर कार्यक्रम बनता है।

    (1945 का ट्रांजिस्टर । जागरण)

    स्टूडियो व नियंत्रण कक्ष में पर्दे के पीछे भी कई चेहरे काम करते हैं। भाषा को लेकर अधिक चिंतन, कोई भी बात बे-सिर पैर की नहीं बोल सकते। राजनीति में किसी के पक्ष में बात नहीं रखते हैं।

    रेडियो 150 किलो का...और भी आकर्षण

    रंजीत नगर के बब्बू लांबा पुरानी चीजें इकट्ठी करने के शौकीन हैं। उनका शौक ऐसा कि गांवों में पिताजी के साथ दूध लेने जाते-जाते तमाम सामान इकट्ठे किए। मिट्टी तेल (केरोसिन) से चलने वाला फ्रिज है। ग्रामीण भारत से जुड़े रेडियो से लेकर और भी सामान हैं। अलग-अलग तरह के गुलदस्ते हैं। प्यानो व ग्रामोफोन है।इनके पास 150 किलोग्राम का रेडियो आकर्षण है।

    (1942 का ट्रांजिस्टर। जागरण)

    रेडियो...रोजगार का कभी न खत्म होने वाला माध्यम

    आरजे मैंडी मनदीप सिंह कहते हैं, रेडियो कभी न खत्म होने वाला रोजगार का माध्यम है। गाड़ी चला रहे, वीडियो नहीं देख सकते पर सुन सकते हैं। खाना बना रहे, दुकान में काम करते सुन सकते हैं। नए-नए कम्युनिटी रेडियो स्टेशन खुलने से संभावनाएं बढ़ रही हैं। बड़ा बाजार बन रहा है। प्रशिक्षण अलग-अलग तरह से सीधे रेडियो या मास कम्युनिकेशन कराने वाली संस्थाओं से ले सकते हैं।

    (1942 के ट्रांजिस्टर की जानकारी देते बब्बू लंबा । जागरण)

    उद्घोषक अनुशासित...जॉकी मन की परोसते

    रेडियो उद्घोषक रंजना कहती हैं, रेडियो जॉकी व उद्घोषक में अंतर ठीक वैसा है, जैसे किसी रिश्तेदार या परिचित के ड्राइंग रूम व सीधे बेड रूम तक पहुंचने का। उद्घोषक संयमित व अनुशासित होते हैं अर्थात ड्राइंग रूम तक होते हैं, जबकि जॉकी सीधे बेड रूम तक पहुंच जाते हैं। समय के हिसाब से बोलते हैं। आरजे मैंडी बताते हैं, हर शो का अलग भाव होता है। पहले निश्चित शो थे, अब 90 प्रतिशत अचानक है। हर कार्य अर्थ से जुड़ गया है। अब कलाकार बंध गया है। उसको वही बोलना है, जो चैनल चाहता है। दायरे तय हैं। इसमें ही छलांग मार लीजिए। लोग क्या सुनने चाहते हैं, वही सुनाइए।

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