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    World Environment Day Special: कुछ अलग है औरैया के एक गांव की आब-ओ-हवा, क्यों कहते हैं पीपल वाला गांव

    By Abhishek AgnihotriEdited By:
    Updated: Sat, 05 Jun 2021 08:03 PM (IST)

    विरासत में मिली पौधारोपण की सीख पर ग्रामीण आज भी कायम रख रहे हैं। गांव और आसपास में कई ऐसे मार्ग जहां घने पीपल के पेड़ों की श्रृंखला देखी जा सकती है। यही वजह है कि लोग पीपल वाला गांव से पुकारने भी लगे हैं।

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    पर्यावरण का संदेश देता एक गांव ।

    औरैया, जेएनएन। शुद्ध आब-ओ-हवा न सिर्फ जीवन को खुशहाल बनाती है बल्कि सेहतमंद भी रखती है। जनपद में भी एक गांव ऐसा है, जहां की आब-ओ-हवा बाकी सब जगह से कुछ अलग है। इतना ही नहीं रोग प्रतिरोधक क्षमता ऐसी है कि बीमारी भी गांव से कोसों दूर रहती है। शायद यही वजह है कि उसकी पहचान अब मल्हौसी न होकर पीपल वाला गांव हो गई है। दूर गांव में रहने वाले भी उसे पीपल वाला गांव कहने लगे हैं।

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    जीवन के लिए आक्सीजन की उपयोगिता क्या है, शायद इस बात को मल्हौसी गांव के लोग काफी पहले आत्मसात कर चुके थे। आक्सीजन न सिर्फ शरीर में प्राण वायु का संचार करती है बल्कि खून में मिलकर रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाती है। यही वजह रही कि गांव में बुजुर्गों का प्रयास आज धरा पर नजर आ रहा है और गांव की पहचान बन चुका है। भले ही कोरोना संक्रमण काल में लोगों ने आक्सीजन का महत्व समझा हो लेकिन इस गांव के लोग वर्षों पहले ही आक्सीजन का महत्व समझ चुके थे। बुजुर्गों के रोपे पौधे आज पेड़ बनकर न सिर्फ छाया दे रहे हैं बल्कि गांव को प्रदूषण मुक्त बनाकर हवा में आक्सीजन घोल रहे हैं।

    मल्हौसी गांव में आज 200 से ज्यादा पीपल के पेड़ हैं। इसकी छांव में गांव की चौपालें लगती हैं। मल्हौसी के अलावा कई ऐसे मार्ग हैं, जहां कतारबद्ध पीपल के पेड़ों की श्रृंखला देखी जा सकती है। यहां बुजुर्गों के नाम पर पीपल का पौधा लगाने की परंपरा रही है। धार्मिक व आध्यात्मिक मान्यता है कि पीपल के पेड़ के पत्ते-पत्ते पर देवाताओं का वास होता है। इसी आस्था से पूजा अर्चना के बाद जब किसी की मनौती पूरी होती है तो वह पीपल का पौधा रोपित करके संरक्षित करने की जिम्मेदारी भी बखूवी निभाता है। नई पीढ़ी भी इसे अपनाकर बखूवी निर्वहन कर रही है।

    गांव वाले कहते हैं बुजुर्गों की परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है। शायद यही वजह है कि गांव के लोग बहुत ही कम बीमार पड़ते हैं, जब कोई बीमारी हो भी जाती है तो बहुत जल्द ठीक हो जाते हैं। शायद इसकी वजह गांव की शुद्ध हवा और आक्सीजन है। पपील के पेड़ के नीचे ही ग्रामीण योग रोजाना योग भी करते हैं। आक्सीजन की मात्रा से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। ग्राम प्रधान मल्हौसी उर्मिला देवी का कहना है कि अपने कार्यकाल में पौधारोपण की मुहिम को जारी रखेंगी। शहर के दिबियापुर रोड के दोनों ओर आधा सैकड़ा पौधे इसी तरह कतारबद्ध लगे हुए हैं, जो पर्यावरण की साख बने हुए हैं।