Kanpur में 35 साल बाद UP Police बेनकाब, कानपुर में प्लाट न देने की रंजिश में रची गई फर्जी मुठभेड़ की कहानी
कानपुर में 35 साल पहले हुए एक फर्जी पुलिस मुठभेड़ का सच अब सामने आया है। सीबीसीआईडी जांच में खुलासा ...और पढ़ें
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HighLights
कानपुर में 35 साल पुराना फर्जी मुठभेड़ उजागर
सीबीसीआईडी जांच में 12 पुलिसकर्मी दोषी पाए गए
निजी रंजिश में निर्दोष नागरिकों को फंसाया गया
शैलेंद्र त्रिपाठी, कानपुर। लालच में अंधी हुई पुलिस ने खुद ही कानून की धज्जियां उड़ा दीं। वर्दी के रौब में निर्दोष नागरिकों को फर्जी मुठभेड़ के जाल में उलझाकर उनकी जिंदगियां तबाह कर दी। 35 साल बाद यूपी पुलिस की खौफनाक साजिश आखिरकार बेनकाब हो गई।
कानपुर के महाराजपुर क्षेत्र में वर्ष 1991 में अंजाम दी गई एक बहुचर्चित पुलिस मुठभेड़ का सच आखिरकार 35 साल बाद सामने आ गया है। सीबीसीआईडी की जांच के बाद यूपी पुलिस का कारनामा उजागर हुआ। तत्कालीन पुलिस अधिकारियों ने निजी रंजिश में 12 निर्दोष नागरिकों को फर्जी मुकदमे में फंसाया था।
शासन के निर्देश पर सीबीसीआईडी ने मामले में शामिल तत्कालीन थानाध्यक्ष सहित 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ जालसाजी, झूठी गवाही, अवैध हिरासत और मारपीट की गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया है। इन 18 पुलिसकर्मी इस साजिश में शामिल पाए गए। इनमें 6 की मौत हो चुकी है।
क्या थी 1991 की घटना?
23 अगस्त 1991 की रात महाराजपुर पुलिस ने दावा किया था कि उन्हें मुखबिर से सूचना मिली थी कि नर्वल मोड़ पर कुछ बदमाश गाड़ियों को रोककर लूटपाट की योजना बना रहे हैं। पुलिस टीम ने मौके पर पहुंचकर बबूल की डालियां डालकर डीसीएम ट्रक (UM-8648) को रोककर लूट का प्रयास कर रहे बदमाशों से मुठभेड़ का दावा किया।
इन लोगों को किया गया था गिरफ्तार
उस समय पुलिस ने मौके से राकेश पाठक, जगदीश द्विवेदी, राम सिंह उर्फ टेशू, कल्लू उर्फ सुरेन्द्र कुमार द्विवेदी, पप्पू सिंह, शिवकुमार, रामू, महेन्द्र सिंह, पप्पू सरदार उर्फ हरजेन्दर सिंह, सरदार अजीत सिंह, लालजी और दिनेश कुमार को गिरफ्तार किया गया था। उनके कब्जे से तमंचे, कारतूस और बम बरामद दिखाकर थाना महाराजपुर में केस दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया गया था।
प्लाट न देने की रंजिश में रची गई थी पूरी साजिश
गांधीग्राम चकेरी निवासी पीड़ित पक्ष के देव प्रसाद पाठक ने शासन में शिकायत देकर न्याय की गुहार लगाई थी। आरोप लगाया था कि तत्कालीन थानाध्यक्ष महाराजपुर विद्यासागर त्रिपाठी मुफ्त में प्लाट की मांग कर रहे। जब प्लाट देने से इन्कार कर दिया तो रंजिश में उनके छोटे भाई राकेश पाठक और उनके साथियों को झूठे मामले में फंसाने के लिए इस फर्जी मुठभेड़ का ताना-बाना बुना गया। शासन के आदेश पर सीबीसीआईडी को जांच सौंपी गई थी।
इस तरह बेनकाब हुआ पुलिस का झूठ
सीबीसीआईडी की जांच में पुलिस का दावा पूरी तरह धराशायी हो गया। डीसीएम चालक व क्लीनर की गवाही से पूरी कहानी बयां हो गई। जिस डीसीएम ट्रक से लूट की कोशिश का दावा किया गया था उसके चालक उमाशंकर और क्लीनर बृजेन्द्र सिंह ने पुलिस की झूठी कहानी का सीबीसीआईडी के सामने पर्दाफाश कर दिया।
साबुन लादकर ले जा रहे थे बनारस
उन्होंने बताया कि वे साबुन लादकर कानपुर से बनारस जा रहे थे। रामादेवी चौराहे से एक सिपाही और अन्य लोग डीसीएम में जबरन सवार हुए और बाद में पुलिस वाहन को थाने ले गई, जहां उनसे कोरे कागजों पर हस्ताक्षर करवा लिए गए थे।
घर में सोते समय की गई थी गिरफ्तारी
जांच में सामने आया कि अभियुक्त बनाए गए लोगों को उनके घरों से सुबह-सुबह सोते समय उठाया गया था। इसके बाद उनके परिवार के पास मौजूद लाइसेंसी हथियारों को ही नाजायज हथियार बनाकर मुठभेड़ की फर्जी कहानी बनाई गई थी।
12 पुलिसकर्मियों पर केस, 6 की मौत
जांच रिपोर्ट के आधार पर सीबीसीआईडी ने आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा 194, 195, 182, 211, 218, 220, 323 और 342 के तहत मामला पंजीकृत किया है। जांच रिपोर्ट में 18 पुलिसकर्मियों के नाम है जिनमें छह की मौत हो चुकी है।
