यूजीसी ने पीएचडी के लिए जारी की नियमावली, चार वर्ष के स्नातक कोर्स के साथ अब पीएचडी भी कर सकेंगे छात्र
नई शिक्षा नीति के तहत पीएचडी के लिए यूजीसी की नियमावली के अनुसार छात्र अब शोध संग स्नातक डिग्री लेने वाले सीधे पीएचडी कर सकेंगे। प्रवेश के लिए चार वर्ष के स्नातक कोर्स में 7.5 ग्रेड अंक लाना जरूरी होगा।

कानपुर, जागरण संवाददाता। नई शिक्षा नीति के तहत चार वर्ष का शोध संग स्नातक (बीए, बीएससी, बीकाम) कोर्स करने वाले विद्यार्थी अब पीएचडी में सीधे प्रवेश ले सकेंगे, लेकिन उन्हें 7.5 ग्रेड अंक लाना जरूरी होगा। इसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग, दिव्यांग और आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को 0.5 ग्रेड अंक की छूट मिलेगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की ओर से इस संबंध में सभी विश्वविद्यालयों को सूचना दी गई है।
यूजीसी ने हाल ही में पीएचडी में प्रवेश के लिए नई शिक्षा नीति के अनुसार नियमावली जारी की है। इसके तहत पहली बार स्नातक (बीए, बीएससी, बीकाम) विद्यार्थियों के लिए सीधे पीएचडी में दाखिले का प्रावधान किया गया है। अभी तक यह नियम केवल चार वर्ष का इंजीनियरिंग कोर्स करने वाले विद्यार्थियों के लिए मान्य था। कानपुर विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (कूटा) के अध्यक्ष डा. बीडी पांडेय ने बताया कि यूजीसी की नई नियमावली के मुताबिक इंजीनियरिंग कोर्स की तरह ही अब शोध के साथ बीए, बीएससी, बीकाम का चार वर्ष का कोर्स करने वाले विद्यार्थी भी बिना मास्टर डिग्री लिए सीधे पीएचडी कर सकेंगे।
पीएचडी कोर्स की अवधि न्यूनतम दो वर्ष और अधिकतम छह वर्ष तय की गई है, इसमें कोर्स वर्क की समयावधि को शामिल नहीं किया गया है। पीएचडी करने के दौरान महिला अभ्यर्थियों को अधिकतम 240 दिन का मातृत्व अवकाश भी मिल सकेगा। इसके साथ ही छात्रों के गाइड (सुपरवाइजर) बनने वाले शिक्षकों के लिए भी अर्हता निर्धारित की गई है।
60 फीसद सीट पर नेट से होंगे प्रवेश
यूजीसी के मुताबिक पीएचडी में 60 फीसद सीटों पर प्रवेश राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) के आधार पर होंगे और बाकी 40 फीसद सीटों पर प्रवेश विश्वविद्यालय अपनी कामन प्रवेश परीक्षा व साक्षात्कार प्रक्रिया के आधार पर ले सकेंगे। हालांकि, सीटें खाली रहने पर विश्वविद्यालय मेरिट के आधार पर किसी भी कैटेगरी के अभ्यर्थियों को अवसर दे सकेंगे।
प्रवेश के समय अभ्यर्थियों को अपने शोध का क्षेत्र व कार्ययोजना बतानी होगी और यह क्षेत्र राष्ट्रीय, सामाजिक या वैश्विक जरूरतों व मूल्यों के आधार पर होना चाहिए।
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