'मैं तिलकहॉल..दुखी हूं, उजियारा फैलाने वाला ‘प्रकाश’ अस्त हो गया', श्रीप्रकाश जायसवाल को लोगों ने दी अंतिम विदाई
कानपुर के पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल, जिन्हें 'प्रकाश' के नाम से जाना जाता था, का निधन हो गया। दिल्ली के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन पर तिलकहॉल में शोक की लहर छा गई, जहां से उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी। हजारों लोगों ने उन्हें अंतिम विदाई दी और उनके योगदान को याद किया। वे कई बार सांसद रहे और उन्होंने कानपुर के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

श्रीप्रकाश जयसवाल को लोगों ने दी अंतिम विदाई।
आशुतोष मिश्र, कानपुर। मैं तिलकहाल...दुखी हूं..शहर में विकास का उजियारा फैलाने वाला ‘प्रकाश’ अस्त हो गया। मेरे राजनीतिक बेटे श्रीप्रकाश ने मेरी गोद में राजनीति का ककहरा सीखा था। मेरे ‘हाथ’ को शहर ही नहीं देशभर में मजबूती दी। मैने तो तुम्हें हमेशा कनपुरिया अंदाज में चुहलबाजी करते, हंसते-हंसाते देखा है। तुम चुनाव के दंगल में जब दिग्गजों को पटकनी देते थे तो मेरा सीना चौड़ा हो जाता था, लेकिन तुम्हें कभी अहं में नहीं देखा, तुम्हारा मिलनसार और सबसे घुलमिल कर रहने का अंदाज सभी के दिलों में बसता था।
यह सच है जो आया है, उसे जाना होगा। फिर भी आज तुम्हें नि:शब्द देख रहा हूं...तुम बोल क्यों नहीं रहे हो...मैं हमेशा की तरह पान से रचे लाल होठों की मुस्कुराहट देखना चाहता हूं.. बेटा मैं द्रवित हूं, दुखी हूं..।
बात वर्ष 1931 की है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की याद में पं. जवाहर लाल नेहरू ने मेरी नींव रखी थी। 24 जुलाई 1934 को मेरा उद्घाटन हुआ तो मैं वजूद में आया। मैने गुलामी का दर्द देखा है तो आजादी की खुली हवा में सांस लेना का अहसास भी मिला। आजादी की लड़ाई में मेरी भूमिका अहम रही।
मैं कांग्रेस के हर दौर का गवाह रहा। मेरी गोद में ही कांग्रेसियों ने बड़े-बड़े फैसले लिए। श्रीप्रकाश..जब तुम जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे तो यहीं बैठकर आंदोलन, चुनाव और अन्य रणनीतियां तय करते थे। मुझे देखकर खुशी होती थी कि व्यवसाय की बारीकियों की तरह राजनीति के दांव भी बखूबी सीख रहे थे। तुम्हें देखकर उसी समय लगने लगा था कि राजनीति की लंबी पारी खेलोगे और यह तुमने करके भी दिखाया।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव की जिम्मेदारी पर रहते हुए तुमने संगठन को गति दी। वर्ष 1989 में नगर प्रमुख और वर्ष 1999 में तुम सांसद बनकर आए तो मैं खुशी से फूले नहीं समा रहा था।
इसके बाद वर्ष 2004 और 2009 में भी तुम चुनावी दंगल में अपने प्रतिद्वंदियों को चित कर सांसद बनकर लौटे। तुम्हारी काबलियत ने ही तुम्हे 2004 में गृह राज्य मंत्री, 2009 में कोयला मंत्री बनाया गया। मैं वह दिन भी नहीं भूला हूं जब 2014 में तुम्हें हार का सामना करना पड़ा था।
मैं तुम्हारी मनोदशा समझता था, लेकिन तुम्हारे ही मुंह से सुनना चाहता था, और सुना भी ये पब्लिक है, कुछ भी फैसले ले सकती..मुझे उनका फैसला सिर माथे। बेटा, सोचा न था आज इस दशा में भी तुम्हें देखूंगा।
ये पवन गुप्ता...संदीप शुक्ला तुम्हें पार्थिव शरीर पर पार्टी का झंडा पहना रहे हैं। अरे....कहां ले जा रहे हो पवन, संदीप अभी मुझे अपने बेटे श्रीप्रकाश से जुदा नहीं होना...मैं दुखी हूं...।

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