सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर संसाधनों को लेकर बेशक हायतौबा मचाई जाती रहे, लेकिन इस व्यवस्था से जुड़े रहे विशेषज्ञ मानते हैं कि संसाधन बड़ा मुद्दा है ही नहीं। सेवानिवृत्त क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी डॉ. निरंकार गोयल का मानना है कि हर सरकार स्वास्थ्य योजनाओं और सुविधाओं पर अच्छा बजट खर्च करती है। जरूरत सिर्फ चिकित्सक और चिकित्सा स्टॉफ की इच्छाशक्ति की है। उनमें मरीजों के प्रति संवेदनाएं जाग जाएं तो सब सुधार हो जाएगा।

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सभी पूरी करते रहें अपनी ड्यूटी
डॉ. निरंकार गोयल का मानना है कि सरकारी व्यवस्था में शामिल अधिकारी और कर्मचारियों की लापरवाही से ही सरकार और सरकारी योजनाएं बदनाम होती हैं। गरीबों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के लिए तमाम योजनाएं हैं। उन पर लाखों-करोड़ों रुपया खर्च भी हो रहा है, लेकिन यह सच है कि उनका लाभ गरीब और मध्यम वर्ग को नहीं मिल पा रहा है। मजबूरन उन्हें निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है।

डॉ. गोयल स्पष्ट कहते हैं कि 70 फीसद सरकारी चिकित्सक और चिकित्सा स्टॉफ ईमानदारी से अपनी ड्यूटी नहीं करते। वह वेतन पूरा चाहते हैं, लेकिन काम नहीं करना चाहते। यदि इन लोगों में मरीजों के प्रति संवेदनाएं जाग जाएं तो यही संसाधन स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर बदल देंगे।

 

प्रशासनिक क्षमता दिखाने की भी जरूरत
सेवानिवृत्त क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी डॉ. गोयल का मत है कि जिलास्तर पर बैठे अधिकारी को अपनी प्रशासनिक क्षमताओं का ढंग से इस्तेमाल करना होगा। चाहे प्यार से या भय दिखाकर व्यवस्था की कड़ी से जुड़े एक-एक व्यक्ति से पूरा काम लेना होगा। जहां एक भी कड़ी कमजोर होती है तो पूरा सिस्टम गड़बड़ा जाता है।

सुधारनी होगी आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थिति
शहर की तुलना में ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को डॉ. गोयल ज्यादा निराशाजनक मानते हैं। उनका कहना है कि महिला और बच्चों के स्वास्थ्य पर निगरानी के लिए आंगनबाड़ी केंद्रों की अहम भूमिका है। अव्वल तो ग्रामीण ही अपने और बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नहीं हैं। इसके अलावा बमुश्किल 20 फीसद आंगनबाड़ी केंद्र ही सक्रियता से चल रहे हैं। इसकी वजह से भी बच्चों में कुपोषण की समस्या बनी हुई है।

सरकार को यह करना होगा सुधार
डॉ. गोयल ने सुझाव देते हुए कहा कि एलोपैथी, आयुर्वेद, होम्योपैथी और यूनानी चिकित्सा पद्धति में नई टेक्नोलॉजी को लाना होगा। स्वास्थ्य केंद्रों पर फर्नीचर से लेकर सभी संसाधन हों। वहां काम करने का माहौल हो, तो चिकित्सक और स्टाफ वहां ड्यूटी के पूरे समय रुकेंगे।

इसके साथ ही स्वास्थ्य केंद्रों पर सभी तरह की जांचों की सुविधाएं हों। वहां जांच सुविधा न हो पाने की वजह से निजी पैथोलॉजी में जाकर गरीब मरीजों को ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है। सरकारी अस्पतालों में सरकार भरपूर मात्रा में दवाइयां उपलब्ध कराती है। इसके बावजूद चिकित्सक बाहर की दवाइयां लिखते हैं। इस व्यवस्था की कड़ी निगरानी होनी चाहिए।

गोयल का कहना है कि प्रशासनिक पद पर विभागीय अधिकारी की ही तैनाती होनी चाहिए। वह अधिकारी सारी परिस्थितियों को बेहतर समझ कर सुधार के प्रयास कर सकेगा। ग्रामीण क्षेत्र में 50 फीसद स्वास्थ्य केंद्र जर्जर हालत में हैं। उनकी मरम्मत करानी चाहिए।

-डॉ. निरंकार गोयल
(सेवानिवृत्त क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी)

By Krishan Kumar