कानपुर, [श्रीनारायण मिश्र]। रेडियो का इतिहास यूं तो बहुत पुराना है, लेकिन कानपुर में आकाशवाणी की विविध भारती सेवा का शुभारंभ 57 साल पहले हुआ था। रेडियो पर 'यह आकाशवाणी कानपुर है...Ó आवाज सुनते ही लोग झूम उठे थे। इसके बाद रेडियो ने खुद को बहुत बदला है और मीडियम वेब से एफएम का दौर आ गया है। इन सबके बीच रेडियो पर विविध भारती के कार्यक्रमों की लोकप्रियता आज भी कम नहीं है। कानपुर के आकाशवाणी केंद्र से ही उत्तराखंड से लेकर उत्तर प्रदेश तक विज्ञापन प्रसारण सेवा करता है। आइए जानते हैं इस लंबे दौर में कैसे बदलता गया कानपुर आकाशवाणी का इतिहास...।

114 साल से पुराना है रेडियो का इतिहास

रेडियो प्रसारण की शुरुआत 24 दिसंबर 1906 की शाम को हुई थी, इस दौरान कनाडा के वैज्ञानिक रेगिनाल्ड फेसेंडेन के बजाये वॉयलिन को अटलांटिक महासागर में तैर रहे तमाम जहाजों के रेडियो ऑपरेटरों ने सुना। इससे पहले जगदीश चन्द्र बसु ने भारत में तथा गुल्येल्मो मार्कोनी ने सन 1900 में इंग्लैंड से अमेरिका बेतार संदेश भेजकर व्यक्तिगत रेडियो संदेश भेजने की शुरुआत कर दी थी, पर एक से अधिक व्यक्तियों को एक साथ संदेश भेजने या ब्रॉडकास्टिंग की शुरुआत 1906 में फेसेंडेन के साथ हुई। ली द फोरेस्ट और चार्ल्स हेरॉल्ड जैसे लोगों ने इसके बाद रेडियो प्रसारण के प्रयोग करने शुरु किए। शुरुआत में रेडियो का प्रयोग सिर्फ नौसेना तक ही सीमित था। 1917 में प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत के बाद किसी भी गैर फौजी के लिये रेडियो का प्रयोग निषिद्ध कर दिया गया।

विश्व का पहला रेडियो स्टेशन

1918 में ली द फोरेस्ट ने न्यूयॉर्क के हाईब्रिज इलाके में दुनिया का पहला रेडियो स्टेशन शुरू किया। पर कुछ दिनों बाद ही पुलिस को खबर लग गई और रेडियो स्टेशन बंद करा दिया गया।

2006 में शुरू हुआ एफएम रेनबो

कानपुर में विविध सेवा भारती का शुभारंभ 1963 में हुआ था, उस वक्त इसे एक किलोवाट के मीडियम वेब के ट्रांसमीटर से किया गया था। 27 दिसंबर 1970 में इस केंद्र को विज्ञापन सेवा केंद्र बनाया गया। 26 जनवरी 1985 से उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के प्राइमरी चैनलों के लिए यहां बुकिंग का काम भी होने लगा। आकाशवाणी केंद्र में सबसे बड़ा बदलाव वर्ष 2006 में आया। जब आकाशवाणी ने एफएम मोड (फ्रीक्वेंसी मॉड्यूलेशन) के दौर में प्रवेश किया। यहां से 102.2 मेगा हर्टज पर एफएम रेनबो का प्रसारण शुरू हुआ, जो बेहद लोकप्रिय माना जाता है। इसका शुभारंभ 11 जुलाई 2006 में तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री प्रियरंजनदास मुंशी और स्थानीय सांसद व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने किया। वर्ष 2012 से एफएम मोड से ही विविध भारती का भी प्रसारण शुरू हो गया।

स्टूडियो में भी बदलती रही तकनीक

एफएम के इस दौर में आकाशवाणी ने लगातार अपनी तकनीक में बदलाव किया। पहले जहां स्टूडियो में कंसोल्ट टेप रिकॉर्डर पर काम किया जाता था, वहीं बाद में पूरा कंप्यूटराइज्ड सिस्टम आ गया। कंप्यूटराइज्ड होने के कारण अब सब कुछ सॉफ्टवेयर आधारित हो गया है। मीडियम वेब से एफएम पर आने के लिए एक विशाल एंटीना का निर्माण भी कराया गया। परिसर में फिलहाल दोनों ही तरह के एंटीना नजर आते हैं, जो रेडियो के बदलते दौर की कहानी कहते हैं।

पुराने दौर में होते थे अनेक कार्यक्रम

कानपुर आकाशवाणी की पहचान अब केवल विज्ञापन केंद्र के रूप में ही सिमट रही है, जबकि यहां पहले बड़ी संख्या में कार्यक्रम भी बनाए जाते थे। विज्ञापनों की रिकॉर्डिंग भी होती थी। कर्मचारी बताते हैं कि उस समय कई कलाकार और उद्यमी यहां विज्ञापन बनवाने के लिए आया करते थे। इन कार्यक्रमों में लोकगीतों के प्रसारण से लेकर स्वास्थ्य और कृषि संबंधी जानकारी भी विशेषज्ञों के माध्यम से दी जाती थी। इसके अलावा बड़ी शख्सियतों के इंटरव्यू भी होते रहते थे। फिलहाल तो यहां विविध भारती के कुल प्रसारण में दो घंटे का कार्यक्रम कानपुर का रहता है। इसमें हैलो कानपुर का प्रसारण भी शामिल है। स्थानीय प्रसारण सुबह 10:05 बजे से 11:00 बजे तक और शाम को छह बजे से सात बजे तक होते हैं। जिसमें श्रोताओं की पसंद के गीत व विविध संगीत कार्यक्रम होते हैं।

आकाशवाणी का कवरेज क्षेत्र

कानपुर आकाशवाणी से विविध भारती का कवरेज क्षेत्र जहां 15386 वर्ग किलोमीटर है, वहीं एफएफ रेनबो की 2826 वर्ग किलोमीटर है। कार्यक्रम का क्षेत्र कानपुर नगर, कानपुर देहात, उन्नाव, औरैया, हमीरपुर, इटावा, हरदोई जिले हैं। जिसमें आकाशवाणी के अनुसार 1.30 करोड़ की आबादी विविध भारती सुनती है।

रेडियो एप पर भी सुनिए विविध भारती

नए दौर के हिसाब से आकाशवाणी ने अपना एप भी बनाया है। गूगल प्ले स्टोर में रेडियो एप रेडियो ऑन एयर को डाउनलोड करके विविध भारती के मधुर संगीत का आनंद लिया जा सकता है।

भारत में रेडियो का इतिहास

  • 1936 में भारत में सरकारी 'इम्पेरियल रेडियो ऑफ इंडियाÓ की शुरुआत हुई जो आज़ादी के बाद ऑल इंडिया रेडियो या आकाशवाणी बन गया।
  • 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत होने पर भारत में भी रेडियो के सारे लाइसेंस रद्द कर दिए गए और ट्रांसमीटरों को सरकार के पास जमा करने के आदेश दे दिए गए।
  • 27 अगस्त 1942 को मुंबई के चौपाटी इलाके के सी व्यू बिल्डिंग से नेशनल कांग्रेस रेडियो का प्रसारण शुरू किया गया।
  • पहले प्रसारण में उद्घोषक उषा मेहता ने कहा, 41.78 मीटर पर एक अन्जान जगह से यह नेशनल कांग्रेस रेडियो है।
  • रेडियो पर विज्ञापन की शुरुआत 1923 में हुई।
  • 12 नवम्बर 1942 को ब्रिटिश सरकार ने नरीमन प्रिंटर और उषा मेहता को गिरफ्तार कर लिया और नेशनल कांग्रेस रेडियो की कहानी यहीं हो गई।
  • नवंबर 1941 में रेडियो जर्मनी से नेताजी सुभाष चंद्र बोस का भारतीयों के नाम संदेश भारत में रेडियो के इतिहास में एक और प्रसिद्ध दिन रहा जब नेताजी ने कहा था, तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा।
  • इसके बाद 1942 में आज़ाद हिंद रेडियो की स्थापना हुई जो पहले जर्मनी से फिर सिंगापुर और रंगून से भारतीयों के लिये समाचार प्रसारित करता रहा।
  • 1947 में आकाशवाणी के पास छह रेडियो स्टेशन थे और उसकी पहुंच 11 प्रतिशत लोगों तक ही थी। अब 223 रेडियो स्टेशन हैं
  • आजादी के बाद 16 नवम्बर 2006 तक रेडियो केवल सरकार के अधिकार में था। धीरे-धीरे आम नागरिकों के पास रेडियो की पहुंच के साथ इसका विकास हुआ।

2016 से कानपुर में छाया रेडियो सिटी

रेडियो सिटी (104.8 एफएम) 10 अक्टूबर 2016 से शहर में छाया हुआ है। इसका जादू 39 राज्यों में लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। रेडियो सिटी की लांचिंग सुबह 10.48 मिनट पर हुई थी, तब से लेकर आज तक 12 राज्यों में फैल चुका है। कानपुर में इसकी फ्रिक्वेंसी 60 किलोमीटर के रेडियस तक फैली हुई है।

लगातार घट रही है विज्ञापन की कमाई

कानपुर प्रसार भारती का विज्ञापन केंद्र है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि निजी रेडियो सेवाओं के शुरू होने से इसकी कमाई खासी प्रभावित हुई है। वर्ष 2016-17 में जो कमाई 24.29 करोड़ थी। वह दो ही साल में घटकर आधी हो गई है। निदेशक एवं कार्यक्रम अधिकारी शोभित मिश्रा कहते हैं कि रेडियो का रूप बदल गया है, अब रेडियो एफएम के रूप में ज्यादा प्रचलित है, मोबाइल व अन्य गैजेट्स पर रेडियो सुना जाता है, लेकिन इसकी लोकप्रियता कम नहीं हुई है। यह बात जरूर है कि शाम का कुछ समय टेलीविजन ने ले लिया है।

Edited By: Abhishek