कानपुर से कनाडा तक छाया पूर्णिमा का पापड़: 150 महिलाओं को दिया रोजगार, कनाडा तक पहुंचा कारोबार
कानपुर की पूर्णिमा ने संघर्षों के बावजूद पापड़ का कारोबार शुरू कर 150 ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है।

रतनपुर के भीतरगांव में बने कारखाने में आलू का पापड़ बनातीं महिलाएं। जागरण
HighLights
पूर्णिमा ने 4 महिलाओं से शुरू किया पापड़ का व्यवसाय।
कनाडा से ऑर्डर मिलने पर 150 महिलाओं को मिला रोजगार।
ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का है उनका लक्ष्य।
स्नेहा दुबे, कानपुर। परिवार में पिता, भाई और पति सभी हों, फिर भी अपने सपनों की राह खुद ही तलाशनी पड़े तो संघर्ष आसान नहीं होता। पूर्णिमा ने भी जीवन में ऐसे कई दौर देखे, जब अपनों से मिले झटकों ने हिम्मत तोड़ने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय अपने सपनों को फिर से खड़ा किया। मिट्टी के दो चूल्हों, दो भगोनों और चार महिलाओं के साथ शुरू हुआ उनका सफर आज 150 ग्रामीण महिलाओं की आजीविका का सहारा बन चुका है।
यह है पूर्णिमा की पूरी कहानी
माता-पिता की इकलौती बेटी पूर्णिमा के सपने शादी तक सीमित नहीं थे। पिता के दबाव में उन्होंने दक्षिण भारतीय युवक से विवाह तो कर लिया, लेकिन आत्मनिर्भर बनने और दूसरी महिलाओं को सहारा देने की इच्छा मन में बनी रही।
विजय नगर स्थित सरस्वती महिला महाविद्यालय से परास्नातक करने के बाद उन्होंने महिलाओं के हित में कई काम किए जिसके लिए उन्हें जिलाधिकारी, मंडलायुक्त और जनप्रतिनिधियों ने सम्मानित भी किया। इसके बाद दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना के तहत 200 लड़कियों को नर्सिंग का प्रशिक्षण दिलाकर उन्हें रोजगार दिलाया। इस योजना के बाद उन्होंने खुद का कारोबार शुरू करने की ठानी।
चार महिलाओं के साथ शुरू किया पापड़ बनाना
किसी की सलाह पर वाराणसी जाकर पापड़ बनाने का प्रशिक्षण भी लिया, लेकिन लाखों रुपये की मशीनें खरीदना संभव नहीं था। फिर भी कारोबार करने का दृढ़ निश्चय कर चुकीं पूर्णिमा ने रतनपुर के गंभीरपुर गांव में किराये पर जगह ली और चार महिलाओं के साथ आलू के पापड़ बनाने शुरू किए।

ग्राहक तलाशने के लिए कई-कई दिनों तक मेस्टन रोड, हटिया और काहूकोठी में भटकीं। इसी बीच एक करीबी ने उनकी महिला सहयोगी के साथ मिलकर पापड़ का ही कारोबार अलग शुरू कर दिया और इससे पूर्णिमा को झटका लगा, लेकिन वह डिगी नहीं, बल्कि तीन महिलाओं की रोजगार की उम्मीद ने उन्हें दोबारा खड़ा होने की ताकत दी। जमापूंजी लगाकर उन्होंने काम फिर शुरू किया।
इस बीच कनाडा में भारतीय उत्पादों का सुपरमार्केट चलाने वाले भूपेंद्र सिंह से उनका संपर्क हुआ। दिल्ली में पापड़ का नमूना पसंद आने पर उन्होंने दो ट्रक पापड़ों का ऑर्डर दे दिया। पूर्णिमा ने करीब 50 महिलाओं को काम पर लगाया और ऑर्डर पूरा कर दिया।
करीब तीन वर्ष पहले शुरू हुए इस पापड़ के कारखाने में आज गांव की लगभग 150 महिलाओं को काम करते हुए आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रही हैं। पूर्णिमा का कहना है कि अगर महिलाएं आत्मनिर्भर बनेंगी तो किसी पर बोझ नहीं रहेंगी।
महिलाओं के सपनों को देना चाहती हैं उड़ान
पूर्णिमा का उद्देश्य केवल पापड़ कारोबार बढ़ाना नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है। वह चाहती हैं कि महिलाएं अपनी कमाई से बच्चों को पढ़ाएं और उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनाएं। उनका कहना है कि सरकार से आर्थिक सहायता मिले तो वह कारोबार का विस्तार कर अधिक से अधिक महिलाओं को रोजगार दे सकती हैं।
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