कानपुर निर्यात उद्योग पर संकट, प्रति कंटेनर का समुद्री भाड़ा पहुंचा 5 हजार डॉलर, 591 करोड़ का घाटा
कानपुर के निर्यात उद्योग पर महंगे समुद्री भाड़े की दोहरी मार पड़ रही है, जिससे पहली तिमाही में निर्यात 591 ...और पढ़ें

यह एक प्रतीकात्मक तस्वीर है।
HighLights
अब बचे छह महीने में अटके आर्डर पूरे करने की चुनौती
पहली तिमाही में निर्यात 591 करोड़ रुपये घटा
पिछले साल 10400 करोड़ का हुआ था निर्यात
जागरण संवाददाता, कानपुर। वैश्विक बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच कानपुर के निर्यात उद्योग पर महंगे समुद्री भाड़े की दोहरी मार पड़ रही है। पिछले छह महीने से निर्यातक ऊंचे माल भाड़े का बोझ उठा रहे हैं।
अब वित्तीय वर्ष के छह महीने बीत चुके हैं और अगले छह महीने में अटके निर्यात आर्डर पूरे करने हैं। ऐसे में यदि समुद्री भाड़े में तत्काल राहत नहीं मिली तो कानपुर का निर्यात उद्योग अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा में और पीछे छूट सकता है। महंगे भाड़े की वजह से पहली तिमाही में पिछले साल के मुकाबले 591 करोड़ रुपये का घाटा हाे चुका है।
नौ माह से निर्यात में बढ़ते समुद्री भाड़ा का संकट झेल रहे निर्यातकों का धैर्य थमने लगा है। यूरोप के लिए फरवरी में डेढ़ हजार डालर का किराया लेने वाली शिपिंग कंपनियां अब प्रति कंटेनर समुद्री भाड़ा पांच हजार डालर ले रही हैं। इसका कारण, समुद्री जहाजों को लालसागर व होर्मुज जलडमरूमध्य के बजाय लंबा चक्कर लगा अफ्रीका के केप आफ गुड होप के रास्ते यूरोपीय देशों तक जाना है।
लगातार महंगा भाड़ा झेल रहे निर्यातक अब केंद्र सरकार से दखल की मांग कर रहे हैं जिससे शिपिंग कंपनियों की मनमानी पर अंकुश लगाया जा सके। कानपुर नगर से अप्रैल से जून 2026 के दौरान करीब 2768 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ है। जबकि वित्तीय वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में यह आंकड़ा करीब 3359 करोड़ रुपये था।
पहली तिमाही के निर्यात में करीब 591 करोड़ रुपये की कमी दर्ज होने के बाद अब निर्यातकों के सामने बड़ी चुनौती केवल नए आर्डर हासिल करने की नहीं, बल्कि पहले से अटके आर्डर को समय पर पूरा कर विदेशी खरीदारों का भरोसा बनाए रखने की भी है।
सैडलरी-हार्नेस में करीब 19 प्रतिशत गिरावट
लेदर सेक्टर में कानपुर से सबसे ज्यादा निर्यात सैडलरी और हार्नेस का होता है। इसमें भी इस साल करीब 19 प्रतिशत की गिरावट बताई जा रही है। ब्रिटेन, नीदरलैंड, चिली और अमेरिका प्रमुख दबाव वाले बाजार रहे जबकि संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, पोलैंड, मलेशिया और मैक्सिको ने मुश्किल वक्त में साथ दिया है।
लेदर फुटवियर के निर्यात में 11 प्रतिशत गिरावट
लेदर फुटवियर के निर्यात में करीब 11 प्रतिशत की गिरावट रही। ब्रिटेन और कनाडा में मांग कमजोर होने का असर कानपुर के निर्यातकों पर पड़ा है। वहीं अन्य चमड़ा उत्पादों में करीब नौ प्रतिशत की गिरावट रही। पिछले साल कानपुर से कुल निर्यात 10400 करोड़ रुपये का हुआ है जिसमें लेदर निर्यात 7200 करोड़ है।
गैर-चमड़ा उत्पादों में भी मांग कमजोर
कानपुर के गैर-चमड़ा उत्पादों में भी मांग में कमी देखी गई है। प्लास्टिक उत्पादों भी महंगे भाड़े की वजह से वैश्विक बाजार में अपनी मांग बनाए रखने में कमजोर साबित हुए हैं। इंजीनियरिंग और रसायन के निर्यात में पिछले तीन महीने में मिला-जुला असर रहा है।
माल भाड़ा महंगा होने के कारण निर्यात की गति धीमी हो गई है। खाड़ी देशों से माल भेजना संभव नहीं हो रहा है। पहली तिमाही के आंकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं। माल - भाड़ा को तत्काल नियंत्रित करने की जरूरत है।
- मुख्तारुल अमीन- राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सीएलई
यूरोप के लिए फरवरी में जो कंटेनर 1500 डालर में जा रहा था, उसका भाड़ा जुलाई में सात हजार डालर से भी ऊपर चला गया था। अभी पांच हजार डालर का भाड़ा मांगा जा रहा है। इससे निर्यात लागत बहुत ज्यादा बढ़ गई है। वर्ष के शेष छह महीने में यदि भाड़े में कमी नहीं आई तो अटके आर्डर की आपूर्ति करना मुश्किल होगा। सरकार को अब भाड़ा राहत, निर्यात प्रोत्साहन और लाजिस्टिक लागत कम करने के लिए तत्काल कदम उठाने होंगे।
- असद के इराकी- पूर्व क्षेत्रीय अध्यक्ष सीएलई
निर्यातकों के अनुसार वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा केवल उत्पाद की गुणवत्ता से नहीं, बल्कि उसकी अंतिम लागत से तय होती है। ऐसे में समुद्री भाड़ा कम किए बिना भारतीय और खासकर कानपुर के निर्यातकों को चीन, वियतनाम, बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धी देशों से मुकाबला करना मुश्किल होगा।
- आलोक श्रीवास्तव , प्रमुख फेडरेशन आफ इंडियन एक्पोर्टर्स उत्तर प्रदेश
