कानपुर में दुर्गा पूजा: 243 साल पहले बंगाली परिवार ने सजाया था माता का दरबार, पंडालों में ब्रिटिश काल का इतिहास
कानपुर में 243 साल पहले एक बंगाली परिवार द्वारा शुरू की गई दुर्गा पूजा अब भव्य रूप ले चुकी है, जहाँ 372 पंडालों में बंगाली संस्कृति का वैभव दिखेगा।

चकेरी कालीबाड़ी में तैयार होता मां का पंडाल। कमेटी
HighLights
372 स्थानों पर सजाए जा रहे हैं दुर्गा पूजा के पंडाल।
एबी विद्यालय में कोलकाता की मिट्टी से 12 फीट की प्रतिमा।
ढाक की ध्वनि मां दुर्गा को अत्यंत प्रिय मानी जाती है।
जागरण संवाददाता, कानपुर। शहर में 243 साल पहले नवरात्र में बंगाली संस्कृति के अनुसार दुर्गापूजा आयोजन शुरू हुए जो आज भव्य स्वरूप ले चुके हैं। दुर्गा पूजा पंडालों का इतिहास ब्रिटिश काल का माना जाता है।
बताते हैं कि वर्ष 1783 में ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर में कृष्णचंद्र मजूमदार का परिवार बंगाल से शहर आया था। जिस जगह इस परिवार ने अपना ठिकाना बनाया, वह क्षेत्र बंगाली मोहाल कहलाया। इसी परिवार ने नवरात्र में देवी पूजन की बंगाली संस्कृति की नींव डाली।
अब शहर में 372 दुर्गा पंडाल सजाए जा रहे हैं। मालरोड स्थित एबी विद्यालय, डीएवी लान, मोतीझील, चकेरी के कालीबाड़ी मंदिर, शास्त्री नगर, किदवई नगर, फूलबाग, श्याम नगर, अरमापुर, ओईएफ, कृष्णा नगर में देवी पंडालों में भक्ति की अलख जगेगी। यहां ढाक की थाप पर धुनुची (बंगाली धूपदान ) नृत्य आध्यात्मिक वैभव की झलक बिखेरेगा।
मुख्य बिंदु-
- 372 स्थानों पर सजाए जा रहे हैं दुर्गा पूजा के पंडाल
- 12 फीट की प्रतिमा बनवा रहे एबी विद्यालय में कोलकाता की मिट्टी से
- 1864 में माल रोड एबी विद्यालय में दुर्गा पूजा शुरू हुई थी
- 1964 से चकेरी स्थित काली बाड़ी मंदिर में हो रहे हैं आयोजन
- 21 अक्टूबर को होगा बंगाली समाज का सिंदूर खेला
बारवारी दुर्गा पूजा समिति हर वर्ष की तरह एबी विद्यालय में पंडाल सजाएगी। यहां 1864 में पहली बार 12 दोस्तों ने देवी पूजन की शुरुआत की थी। समिति के सचिव अवीक घोष ने बताया कि कोलकाता से मंगाई गई मिट्टी से मां की 12 फीट की प्रतिमा बनवाई जा रही है। श्री श्री चकेरी काली बाड़ी में 62वां दुर्गा पूजा महोत्सव मनाया जाएगा।
दीपांकर भट्टाचार्य ने बताया कि पश्चिम बंगाल के कारीगर पंडाल तैयार कर रहे हैं। मां की प्रतिमा में प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल हो रहा है। सार्वजनिन दुर्गा पूजा कमेटी अरमापुर इस्टेट में 13 फुट की महिषासुर मर्दन करते हुए प्रतिमा होगी। 19 को धुनुची नृत्य विशेष आकर्षक होगा।
कोरोनाकाल से बंद ओईएफ नवशक्ति दुर्गा पूजा समिति की दुर्गा पूजा इस बार फिर ओइएफ स्टेडियम में होगी। योगेंद्र सिंह चौहान ने बताया कि पंडाल में आत्मनिर्भर भारत की थीम रहेगी। स्क्रीन पर बुलेट प्रूफ जैकेट, सेना की यूनीफार्म और टेंट के बारे में जानकारी दी जाएगी।
मां को पसंद है ढाक की ध्वनि
बंगाली समाज के लोग दुर्गा पूजा में ढाक बजाने वालों को बुलाते हैं। पश्चिम बंगाल से शारदीय नवरात्र में 100 से 110 ढाक बजाने वाले आते हैं। दुर्गा पूजन के दिन आरती में हर रोज ढाक बजाया जाता है। यह ढोल जैसा वाद्ययंत्र होता है, लेकिन एक तरफ से ही बजता है। सार्वजनिक दुर्गा पूजा पूजा कमेटी अरमापुर स्टेट के पंडाल व डेकोरेशन संयुक्त सचिव तुषार गांगुली ने बताया कि मान्यता है कि ढाक की ध्वनि मां को पसंद है। ढाक बजाए जाने से मां खुश होती है। इसलिए ढाक बजाने वालों को बुलाया जाता है। इन्हें समितियां छह माह का राशन और कपड़े देकर विदा करते हैं।
पंडालों में पूजन
| तारीख | बारवारी दुर्गा पूजा समिति | श्री श्री चकेरी काली बाड़ी | ओईएफ नवशक्ति दुर्गा पूजा समिति |
| 15 अक्टूबर | - | आनंद मेला व उद्घाटन | - |
| 16 अक्टूबर | संध्या के समय देवी का बोधन, आमंत्रण, अधिवास | मां का आगमन और बोधन | भजन संध्या |
| 17 अक्टूबर | स्तापन, सप्तमी आदि कल्पारंभ और सप्तमी-विहित पूजा | नवपत्रिका स्नान व सप्तमी पूजा | डांस कंपटीशन |
| 18 अक्टूबर | सप्तमी विहित अधिक पूजा | महाअष्टमी की पूजा, पुष्पांजलि व संधि पूजा | झांकी |
| 19 अक्टूबर | कल्पारंभ, महाष्टमी पूजा, संधि पूजा | अष्टमी की संधि बेला के साथ नवमी पूजा | डांडिया |
| 20 अक्टूबर | कल्पारंभ और महानवमी विहित पूजा | - | महिला कीर्तन |
| 21 अक्टूबर | दशमी विहित पूजा समापन के बाद विसर्जन | - | - |
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